रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
पृष्ठ 88, कुल 584 में से
संदर्भ में पढ़ें( ६२ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । कंकुष्ठं गैरिकं शंखं काशीशं टंकणं तथा । नीलाञ्जनं शुक्तिभेदा खुल्वका सवराटका ॥ ४५ ॥ जम्बीरवारिणा स्विन्नाः क्षालिताः कोष्णवारिणा । शुद्धिमायान्त्यमी योज्या भिषग्भिर्योगसिद्धये ॥४६॥ कंकुष्ठ, गेरू, शंख, काशीस, सुहागा, सुरमा, सब प्रकारकी सिप्पिएँ ( सींप ), खुल्वक ( नख गंधद्रव्य ) और कौडिएं यह सब जम्बीरी नींबूके रसमें स्वेदन कर गरम पानीसे धो देनेसे शुद्ध होजाते हैं । इनमेंसे जिस पदार्थको शुद्ध करना हो जंबीरीके रसमें दोलायन्त्रद्वारा स्वेदन कर गरम पानीसे धोवे तो शुद्ध होजाता है । फिर जिस कर्ममें प्रयोग करना हो करे ॥ ४५ ॥ ४६ ॥ टकण ( सुहागे ) - के नाम । टंकणं क्रामणष्टंकः सम्यकक्षारश्च पाचनः । शुभगो मालतीजातो द्रवी लोहविशुद्धिदः ॥४७॥ टंकण, क्रामण, टंक, सम्यक्क्षार, पाचन, शुभग, मालतीजात, द्रावक, लोहशुद्धिकारक यह सुहागेके नाम हैं ॥ ४७ ॥ सुहागेका शोधन । आदौ टंकणमादाय काञ्जिकास्ले विनिःक्षिपेत् । एकरात्रात् समुद्धृत्य शोषयेद्वै चिरातपे ॥ ४८ ॥ नरमृत्रगतं टंकं गवां मूत्रगतं तथा । दिनान्ते तत्समुद्धृत्य जम्बीराम्बुगतं ततः ॥ ४९॥ जम्बीराम्लात्समुद्धृत्य नारिकेलस्य पात्रके । मरीचचूर्णसंयुक्तं क्षालयेच्छीतलाम्बुना ॥ टङ्कणं वह्नियोगेन सूत्फुल्लं शुद्धतां व्रजेत् ॥ २५० ॥