भारतकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

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प्रस्तावना । ॥ श्रीगुरवे नमः ॥ रसवैद्यो देववैद्यो मानुषो मूलकादिभिः । अधमः शस्त्रदाहाभ्यां सिद्धवैद्यस्तु मांत्रिकः ॥ संसारमें आयुर्वेद शास्त्रसे बढकर उभयलोककल्याणकारी दूसरा शास्त्र नहीं है। इसके द्वारा मनुष्य सहज ही धर्मादि चतुर्विध पुरुषार्थका साधन कर सकता है। और इस शास्त्रका जाननेवाला तो साधारण अवस्थामें रहते हुए भी एक चक्रवर्ती राजासे बढकर दान कर सकता है और किसी अधिक परिश्रमके बिनाही धर्म, मान और यशको प्राप्त कर लेता है । परंतु आयुर्वेद शास्त्रका जाननेवाला होना चाहिये । आयुर्वेद शास्त्रकी अवस्था यद्यपि इस समय कई कारणोंसे अच्छी नहीं है । इसका सम- याधीन वह आदरभी नहीं रहा । एवं इस विद्याके सर्वांगज्ञाता भी बहुत कम हैं परंतु फिर भी यह शास्त्र संसारका असीम उपकार कर रहा है, इसका पहला उपदेश सदाचार है, सदाचारके बिगडनेसे ही मनुष्यका आरोग्य बिगडता है । वर्तमान समयमें सदाचारकी अव्यवस्थासे ही मनुष्योंकी दुरवस्था है,सदाचारके बिगडनेसे ही आलसी, रोगी, बल- वीर्य-पराक्रमहीन और लक्ष्मीहीन हो रहे हैं । इस दुरवस्थासे बचानेके लिये आयुर्वेदका सबसे बडा अंग चिकित्सा है.उस चिकित्सा शास्त्रमें रस चिकित्सा, वनौषधि चिकित्सा, शस्त्रदाहादि चिकित्सा और मंत्र- चिकित्सा इन भेदोंसे चार प्रकारकी चिकित्सा है। इनमें मंत्रचिकित्सा तो अब लुप्तप्रायसी है इसके ज्ञाताओंको सिद्धवैद्य कहते थे । शस्त्र- द्वारा ( सर्जरी ) चिकिसा करना, तथा अग्निदाह, क्षारदाह, जलौका, तुंबी आदिसे जो चिकित्सा की जाती है इसको शल्यतंत्र और शालाक्य तंत्र कहते हैं इसके जाननेवालोंको कायचिकित्सावालोंने अधम माना है, जडी बूटियोंसे जो चिकित्सा की जाती है इसको मानुषी चिकित्सा कहते हैं और रसों द्वारा जो चिकित्सा की जाय उसे दैवी चिकित्सा कहते हैं ।