भारतकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

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( ६८ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । चांदीका शोधन-मारण । उत्तम ( तार ) चांदीके लक्षण । दग्धोत्तीर्णं सुशीतं यन्निर्मलं कुन्दसन्निभम् । गुरु स्निग्धं कुमारञ्च तारमुत्तममिष्यते ॥ ६८ ॥ जो चांदी अग्निमें तपाकर लाल होनेपर निकालकर ठंढी की जानेसे उत्तम सफेद वर्ण रहे, भारी हो, चिकनी हो और नरम हो उसे उत्तम चांदी जाननी ॥ ६८ ॥ अशुद्ध चान्दी ( रौप्य ) के दोष । आयुः शुक्रं बलं हन्ति रोगसङ्घं करोति च । अशुद्धं चामृतं तारं शुद्धं ग्राह्यमतो बुधैः ॥ ६९ ॥ अशुद्ध और मारणमें कच्ची रही हुई चान्दी आयु, शुक्र और बल को नष्ट करती है एवं रोगोंके समूहको पैदा करती है इसलिये बुद्धि- मानोंको शुद्ध चान्दी लेना ही सब कर्मोंमें श्रेष्ठ है ॥ ६९ ॥ चान्दीका शोधन । नागेन क्षारराजेन द्रावितं शुद्धिमृच्छति । रजतं दोषनिर्मुक्तं किं वा क्षाराम्लपाचितम्॥२७०॥ सिक्का और सुहागा मिलाकर चान्दीको तीक्ष्णाग्निमें रखकर पिघलावे तो सिक्का चांदीका दोष लेकर उड जायगा और चान्दी निर्दोष शुद्ध हो जायगी। अथवा चान्दीके पात्रोंको तपा तपा कर सुहागा मिले खटा- ईके बीचमें बार २ बुझानेसे भी चान्दी शुद्ध हो जाती है ॥ २७० ॥ चान्दीके मारनेकी विधि । माक्षिकं गन्धकञ्चैवमर्कक्षीरेण मर्दयेत् । तेन लिप्तं रूप्यपत्रं पुटेन म्रियते ध्रुवम् ॥ ७१ ॥