रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)
Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary
रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें: १ : रीतिकाल का परिचय हिन्दी-साहित्य मे रीतिकाल का आविर्भाव संवत् १७०० से १६०० तक माना जाता है। इस काल मे दो साहित्यिक धाराएँ युगपद् प्रवाहित होती हुई भी एक-दूसरी से नितान्त भिन्न है। एक धारा है रीतिबद्धमार्गी, जो काव्य- शास्त्रीय नियमो का अनुसरण करती है। इस धारा के दो वर्ग है। एक वर्ग तो उन लोगो का है जिनके कवित्व के साथ आचार्यत्व का गठबधन है। केशव, जसवंतसिंह, चिन्तामणि, देव, भूषण, कुलपति मिश्र आदि इसी वर्ग के अन्तर्गत आते है। दूसरा वर्ग उन लोगो का है जिन्होन काव्यशास्त्रीय विवेचन तो नही किया, पर उसके आधार पर अपने ग्रन्थो की रचना की है। बिहारी, मधु- सूदन, रसलीन, सेनापति आदि इसी वर्ग के अन्तर्गत आते है। इस काल मे जो काव्यशास्त्रीय विवेचन हुआ है, वह प्राय. सस्कृत काव्य- शास्त्र की सीमाओ मे ही आबद्ध रहा है । रीतिकालीन आचार्यों मे, इसी कारण, नगण्य मौलिकता परिलक्षित होती है। जहाँ तक उद्देश्य का प्रश्न है, रीतिकालीन आचार्यों का उद्देश्य सस्कृत-आचार्यों से भिन्न था। सस्कृत का काव्यशास्त्र समय-समय पर रसवाद, अलंकारवाद, रीतिवाद, ध्वनिवाद तथा वक्रोक्तिवाद का समर्थन एवं खडन-मडन प्रस्तुत करता रहा है। हिन्दी के रीति- कालीन आचार्य खंडन-मडन के इन पचडो मे नही पडे है। इन आचार्यों में से कुछ आचार्यों ने नायिका-भेद निरूपण किया है, कुछ ने अलकार ग्रथो का निर्माण किया है और कुछ आचार्यों ने इन दोनो का सृजन किया है। नायक- नायिका-भेद के निरूपण का आधार प्राय भानुमिश्र रहे है और अलकारो के लिए अप्पय दीक्षित । संस्कृत के ये दोनो आचार्य भानुमिश्र और अप्पय दीक्षित किसी भी काव्यशास्त्रीय वाद से आबद्ध नही थे। हिन्दी के कुछ आचार्य, जो