भारतकोश
रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा

DevanagariBrajpublished368 पृष्ठ

पृष्ठ 332, कुल 368 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 332

व्याख्या भाग ३१५. सवैया सार की सारी सो पारी लगै धरिबे कहँ सीस बघम्बर पैया । हाँसी सो दासी सिखाइ लई है वेई जु वेई रसखानि कन्हैया ॥ जोग गयौ कुबजा की कलानि मै री कब ऐहै जसोमति मैया । हाहा न ऊधौ कुढाओ हमे अब ही कहि दै ब्रज बाजै बधैया ॥२५१॥ शब्दार्थ —सार=लोहा । बाघम्बर=वाघ की खाल । पैया=पाया हुआ । अर्थ—उद्धव का निर्गुण गुरु का उपदेश सुनकर गोपियाँ उससे कहती हैं कि हे उद्धव ! तुम हमे सीस पर बाघम्बर धारण करने को कहते हो, पर वह बाघम्बर हमे लोटे की साडी से भी भारी लगता है । जिसमे हसी-हँसी मे कुब्जा को अपने वश मे कर लिया है, वे ही—केवल वे ही हमारे आनन्द सागर कृष्ण है । तुम्हारा योग तो कुब्जा की चतुरता मे दब गया । हे उद्धव ! हमे बहुत दुख है । तुम हमे अधिक दुखी न करो । हम अभी कह देती हैं कि ब्रज मे बधाई के वाजे बाजे । ब्रज-प्रेम सवैया या लकुटी अरु कामरिया पर राज तिहुँ पुर को तजि डारौ । आठहु सिद्ध नवौ निधि को सुख नन्द की गाइ चराइ बिसारौ ॥ ए रसखानि जबै इन नैनन ते ब्रज के वन बाग तडाग निहारौ । कोटिक ये कलधौत के धाम करील की कुन्जन ऊपर वारौ ॥ २५२ ॥ शब्दार्थ—वा=उस । लकुठी=लाठी । तिहुँ पुर को=तीनो लोको को । सिद्ध=अलौकिक शक्ति, सिद्धियाँ आठ मानी गई है—अणिमा, महिमा, गरिमा लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व और कशित्व । अणिमा सिद्धि से योगी अणुरूप धारण करके अदृश्य हो जाता है । महिमा सिद्धि से योगी अपने देह का चाहे जितना विस्तार कर सकता है । गरिमा सिद्धि से योगी अपने शरीर का चाहे जितना भार बढ़ा सकता है । लघिमा सिद्धि से योगी चाहे जितना छोटा और हलका हो सकता है । प्राप्ति सिद्धि से प्रत्येक पदार्थ प्राप्त किया जा सकता है । प्राकाम्य सिद्धि से योगी जो चाहता है, वही हो जाता है । ईशित्व सिद्धि- के बल पर दूसरो पर प्रभुत्व किया जा सकता है । वाशित्व के सिद्धि के बल पर चाहे जिसको वश मे किया जा सकता है । निधि=अपूर्व वैभव,.