रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)
Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary
रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा
मन प्रेमपूर्ण हो जाता है । यदि योग धारण करने से प्यारा कृष्ण मिल जाय तो हमे अपने कान फटवा लेने से भी कोई दुख नही अर्थात् हम सहर्ष अपने कान फटवा सकती है । यदि कृष्ण की यही इच्छा है कि हम उन्हे छोड़कर योग साधना शुरू कर दे तो हे सखि ! सब आजायो और मिलकर गोरखनाथ का अलख जगाओ । कैसा यह देस निगोरा, जग होरी ब्रज होरा । मैं जल जमना भरन जात रही, देखि बडन मेरा गोरा । मोसो कहै चलो कुंजन मे, तनक-तनक से छोरा । परे आँखिन मे डोरा ॥ जिमरा देखि डरात सखी री, लाज भरम को ओरा । का बूढे का लोग लुगाई, एक ते एक ठिठोरा । न काहू सो काहू को जोरा । मन मेरो हर्यो नद के ने सखि,चलत लगावत चोरा । कहै रसखान सिखाइ सखन सो, सब मेरा अग टटोरा । न मानत कहत निहोरा ॥ ६ ॥ शब्दार्थ—निहोरा = निगोडा तनक तनक सो = छोटे छोटे । डोरा = काजल । ठिठोरा = धृष्ट । निहोरा = विनय । अर्थ-कोई गोपी अपनी सखी से कह रही है कि हे सखि ! यह निगोडा देश कैसा है और ब्रज तो सारे जग से बढकर है । मैं यमुना मे पानी भरने के लिए जा रही थी कि मेरे गोरे शरीर को देखकर मेरे सौन्दर्य पर रीझ कर, छोटे-छोटे बच्चे भी जो आँखों मे काजल लगाए हुए थे, मुझ से कहने लगे कि कुन्जो मे चलो । उन्हें देखकर मेरा मन डर गया, लज्जा सकट मे पड गई । क्या बूढे, क्या लोग और स्त्रियाँ, यहाँ ब्रज मे तो सब एक-दूसरे से बढ़-चढकर धृष्ट हैं, कोई किसी से के जोड़े मे नही आता, अर्थात् सभी अनुप- मेय है। हे सखि ! मेरा मन कृष्ण ने हर लिया है, वह चोरी-चोरी मेरे पीछे चलता है और अपने सब साथियो को सिखा कर मेरी तलाशी लिवा लेता है । उससे चाहे कितनी विनय करो, पर वह किसी की कोई बात नही सुनता । दोहा परम चतुर पुनि रसिकवर, कैसो हू नर होय । विना प्रेम रूखो लगै , वादि चतुरई सोम ॥ १० ॥ शब्दार्थर्—सिकवर = भावुक । वादि = व्यर्थ । चतुराई = चतुरता । अर्थ-इस दोहे मे कृष्ण-प्रेम की महत्व का वर्णन किया गया गया है । चाहे मनुष्य कितना ही चतुर और भावुक हो परन्तु यदि उसमे कृष्ण के प्रति प्रेम नही है तो वह नीरस है और उसकी सारी चतुराई व्यर्थ है ।
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