ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 1010, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंता हि क्षत्रं धारयेथे अनु द्यून् दृंहेथे सानुमुपमादिव द्योः. दृळ्हो नक्षत्र उत विश्वदेवो भूमिमातान्द्यां धासिनायोः.. (६) हे मित्र और वरुण! तुम प्रतिदिन बल धारण करते हो. तुम अंतरिक्ष के उन्नत प्रदेश को खंभे के समान दृढ़ करते हो. तुम्हारे द्वारा दृढ़ किए गए नक्षत्र एवं संपूर्ण देव मानवों के हव्य से तृप्त होकर धरती और आकाश को व्याप्त करते हैं. (६) ता विग्रं धैथे जठरं पृणध्या आ यत्सद्म सभृतयः पृणन्ति. न मृष्यन्ते युवतयोऽवाता वि यत्पयो विश्वजिन्वा भरन्ते.. (७) हे मित्र एवं वरुण! तुम अपना पेट सोमरस से भरने के लिए यजमान की रक्षा करते हो. हे विश्वजिन्वा! जब ऋत्विज् यज्ञशाला को भर देते हैं एवं तुम जल बरसाते हो. उस समय युवतियां—सरिताएं धूल से पराजित नहीं होतीं, अपितु सूखी, नदियां भी जल से भर जाती हैं. (७) ता जिह्वया सदमेदं सुमेधा आ यद्वां सत्यो अरतिर्ऋते भूत्. तद्वां महित्वं घृतान्नावस्तु युवं दाशुषे वि चयिष्टमंहः.. (८) हे घृत एवं अन्न धारण करने वाले मित्र और वरुण! शोभनबुद्धि वाले लोग स्तुतिवचनों द्वारा तुमसे सदा जल की याचना करते हैं. जिस प्रकार तुम्हारा भक्त यज्ञ में मायारहित होता है, उसी प्रकार तुम्हारा महत्त्व हो. तुम हव्यदाता का पाप नष्ट करो. (८) प्र यद्वां मित्रावरुणा स्पूर्धन्प्रिया धाम युवधिता मिनन्ति. न ये देवास ओहसा न मर्ता अयज्ञसाचो अप्यो न पुत्राः.. (९) हे मित्र एवं वरुण! तुम्हारे प्रिय एवं तुम्हारे द्वारा किए जाते हुए यज्ञकर्मों को जो अयाजक लोग तुमसे स्पर्धा करते हुए नष्ट करते हैं, जो देव एवं मानव स्तोत्र नहीं बोलते, जो कर्म करते हुए भी यज्ञहीन हैं एवं जो पुत्रयुक्त नहीं हैं, उन सबको नष्ट करो. (९) वि यद्वाचं कीस्तासो भरन्ते शंसन्ति के चिन्निविदो मनानाः. आद्वां ब्रवाम सत्यान्युक्था नकिर्देवेभिर्यथथो महित्वा.. (१०) हे मित्र एवं वरुण! मेधावी उद्गाता जब अलग-अलग स्तुतियां बोलते हैं, कुछ अग्नि आदि देवों की स्तुति करते हुए स्तोत्र बोलते हैं एवं तुम्हारे उद्देश्य से हम सच्चे मंत्र बोलते हैं, तब तुम अन्य देवों के साथ मत चले जाना. (१०) अवोरित्था वां छर्दिषो अभिष्टौ युवौर्मित्रावरुणावस्कृधोयु. अनु यद् गावः स्फुरानृजिष्यं धृष्णुं यद्रणे वृषणं युनजन्.. (११) हे रक्षक मित्र और वरुण! जिस समय स्तुतियां बोली जाती हैं एवं यजमान यज्ञ में ebook converter DEMO Watermarks*