ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 1013, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंसं वां कर्मणा समिषा हिनोमीन्द्राविष्णू अपसस्पारे अस्य. जुषेथां यज्ञं द्रविणं च धत्तमरिष्टैर्नः पथिभिः पारयन्ता.. (१) हे इंद्र एवं विष्णु! मैं तुम्हारे निमित्त स्तोत्र एवं हवि प्रदान करता हूं. इस उक्थ की समाप्ति पर तुम यज्ञ का सेवन करना. हमें उपद्रवरहित मार्ग पर पार ले जाने वाले तुम दोनों धन दो. (१) या विश्वासां जनितारा मतीनामिन्द्राविष्णू कलशा सोमधाना. प्र वां गिरः शस्यमाना अवन्तु प्र स्तोमासो गीयमानासो अर्कैः.. (२) हे समस्त स्तुतियों के जनक एवं कलशरूप में सोमरस के आधार इंद्र एवं विष्णु! बोली जाती हुई स्तुतियां तुम्हें प्राप्त हों. स्तोताओं द्वारा गाए जाते हुए स्तोत्र तुम्हारे पास पहुंचें. (२) इन्द्राविष्णू मदपती मदानामा सोमं यातं द्रविणो दधाना. सं वामञ्जन्वक्तुभिर्मतीनां सं स्तोमासः शस्यमानास उक्थैः.. (३) हे मदकारक-सोम के स्वामी इंद्र एवं विष्णु! तुम धन देते हुए सोमरस के सामने आओ. स्तोताओं के स्तोत्र एवं बोले जाते हुए उक्थ तुम्हें तेज के साथ प्राप्त हों. (३) आ वामश्वासो अभिमातिषाह इन्द्राविष्णू सधमादो वहन्तु. जुषेथां विश्वा हवना मतीनामुप ब्रह्माणि शृणुतं गिरो मे.. (४) हे इंद्र एवं विष्णु! हिंसकों को हराने वाले एवं परस्पर प्रसन्न होने वाले घोड़े तुम्हें वहन करें. तुम स्तोताओं के समस्त स्तोत्रों के साथ-साथ मेरे स्तुतिवचनों को भी सुनो. (४) इन्द्राविष्णू तत्पनयाय्यं वां सोमस्य मद उरु चक्रमाथे. अकृणुतमन्तरिक्षं वरीयोऽप्रथतं जीवसे नो रजांसि.. (५) हे इंद्र एवं विष्णु! तुम सोम के नशे में महान् कर्म करते हो, अंतरिक्ष को विस्तृत बनाते हो एवं लोगों को हमारे जीवन में उपयोगी बनाते हो. ये सब कर्म प्रशंसा के योग्य हैं. (५) इन्द्राविष्णू हविषा वावृधानाग्रा मद्द्वाना नमसा रातहव्या. घृतासुती द्रविणं धत्तमस्मे समुद्रः स्थः कलशः सोमधानः.. (६) हे सोम द्वारा बढ़े हुए इंद्र एवं विष्णु! तुम घी एवं अन्न से युक्त हो. तुम सोम के उत्तम भाग का सेवन करने वाले यजमानों द्वारा नमस्कार के साथ हव्य प्रदान करने वाले हो. तुम सागर एवं कलश के रूप में सोम के आधार हो. तुम हमें धन दो. (६) इन्द्राविष्णू पिबतं मध्वो अस्य सोमस्य दस्रा जठरं पृणेथाम्. आ वामन्धांसि मदिराण्यूग्मन्नुप ब्रह्माणि शृणुतं हवं मे.. (७) ebook converter DEMO Watermarks*