ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 1015, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंमधु नो द्यावापृथिवी मिमिक्षतां मधुश्चुता मधुदुघे मधुव्रते. दधाने यज्ञं द्रविणं च देवता महि श्रवो वाजमस्मे सुवीर्यम्.. (५) जल क्षरण करने वाली, जल टपकाने वाली, जल के निमित्त कर्म करने वाली, देवतारूप, हम लोगों को यज्ञ, धन, विशाल-यश, अन्न एवं शोभनवीरता देती हुई द्यावा-पृथ्वी हमें मधु से सींचें. (५) ऊर्जं नो द्यौश्च पृथिवी च पिन्वतां पिता माता विश्वविदा सुदंससा. संरराणे रोदसी विश्वशम्भुवा सनिं वाजं रयिमस्मे समिन्वताम्.. (६) हे पिता द्यौ एवं माता पृथ्वी! हमें अन्न दो. सबको जानने वाली, शोभनकर्म वाली, परस्पर रमण करती हुई एवं सबको सुख देने वाली द्यावा-पृथ्वी हमें संतान, बल एवं धन दें. (६) सूक्त—७१ देवता—सविता उदु ष्य देवः सविता हिरण्यया बाहू अयंस्त सवनाय सुक्रतुः. घृतेन पाणी अभि प्रुष्णुते मखो युवा सुदक्षो रजसो विधर्मणि.. (१) शोभनकर्म वाले सविता देव अपनी स्वर्णमय भुजाओं को दान के लिए उठाते हैं. महान्, नित्ययुवा व शोभनबुद्धि सविता लोक को धारण करने के लिए अपने जलपूर्ण हाथों को बढ़ाते हैं. (१) देवस्य वयं सवितुः सवीमनि श्रेष्ठे स्याम वसुनश्च दावने. यो विश्वस्य द्विपदो यश्चतुष्पदो निवेशने प्रसवे चासि भूमनः.. (२) हम उन्हीं सविता देव के अनुज्ञात एवं प्रशंसनीय दान पाने में समर्थ हों, जो सभी द्विपद एवं चतुष्पद और प्राणियों की स्थिति और जन्म में स्वतंत्र हैं. (२) अदब्धेभिः सवितः पायुभिष्ट्वं शिवेभिरद्य परि पाहि नो गयम्. हिरण्यजिह्वः सुविताय नव्यसे रक्षा माकिर्नो अघशंस ईशत.. (३) हे सविता! तुम अपने अहिंसित एवं सुखकारक तेजों द्वारा हमारे घर की रक्षा करो. हे हिरण्यवाक्! तुम नवीन सुख एवं रक्षा के कारण बनो. हमारा अहित चाहने वाला हमारा स्वामी न हो. (३) उदु ष्य देवः सविता दमूना हिरण्यपाणिः प्रतिदोषमस्थात्. अयोहनुर्यजतो मन्द्रजिह्व आ दाशुषे सुवति भूरि वामम्.. (४) दानयुक्त मन वाले, स्वर्णमय हाथों वाले, सोने की ठोड़ी वाले, यज्ञ के पात्र व प्रसन्नवचन ebook converter DEMO Watermarks*