ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 1025, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंहे अग्नि! हमें संतानहीन मत बनाओ. हमें बुरे कपड़े और बुरी बुद्धि मत देना. हमें भूख और राक्षस को मत सौंपना. हे सत्ययुक्त अग्नि! हमें न घर में मारना और न वन में. (१९) नू मे ब्रह्माण्यग्न उच्छशाधि त्वं देव मघवद्भ्यः सुषदः. रातौ स्यामोभयास आ ते यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः.. (२०) हे अग्नि! मेरे लिए अन्नों को विशेषरूप से शुद्ध करना. हे देव! हम हव्ययुक्तों को तुम अन्न दो. हम यजमान और स्तोता दोनों तुम्हारे दान के पात्र बनें. तुम सदा कल्याणों द्वारा हमारा पालन करो. (२०) त्वमग्ने सुहवो रण्वसन्दृक् सुदीती सूनो सहसो दीदिहि. मा त्वे सचा तनये नित्य आ धङ्मा वीरो अस्मन्नर्यो वि दासीत्.. (२१) हे शक्ति के पुत्र, शोभन आह्वान वाले एवं रमणीयदर्शन अग्नि! तुम उत्तम प्रकाश के साथ प्रदीप्त बनो! तुम मेरे पुत्र के सहायक बनो एवं उसे मत जलाओ. हमारा मानवहितकारी पुत्र नष्ट न हो. (२१) मा नो अग्ने दुर्भृतये सचैषु देवेद्धेष्वग्निषु प्र वोचः. मा ते अस्मान्दुर्मतयो भृमाच्छिद्देवस्य सूनो सहसो नशन्त.. (२२) हे सहायक अग्नि! ऋत्विजों द्वारा अग्नियों के प्रज्वलित होने पर उनसे हमें दुःखपूर्वक मरण के लिए मत कहो. हे प्रज्वलित एवं बलपुत्र अग्नि! तुम्हारी दुर्बुद्धि भ्रम से भी हमें न प्राप्त हो. (२२) स मर्तो अग्ने स्वनीक रेवानमर्त्ये य आजुहोति हव्यम्. स देवता वसुवनिं दधाति यं सूरिरर्थी पृच्छमान एति.. (२३) हे शोभनतेज वाले एवं देवतारूप अग्नि! तुम्हें हव्य देने वाला मनुष्य धनवान् होता है. वे अग्नि देव यजमान को धन देते हैं, जिनके पास धन चाहने वाला स्तोता पूछने के लिए जाता है. (२३) महो नो अग्ने सुवितस्य विद्वान् रयिं सूरिभ्य आ वहा बृहन्तम्. येन वयं सहसावन्मदेमाविक्षितास आयुषा सुवीराः.. (२४) हे अग्नि! तुम हमारे महान् कल्याणकारी कार्यों को जानते हो. हम स्तोताओं को तुम महान् धन दो. हे बलपुत्र अग्नि! उस धन से हम क्षयरहित, पूर्ण आयु वाले व शोभन पुत्र-पौत्रों वाले होकर प्रसन्न बनें. (२४) नू मे ब्रह्माण्यग्न उच्छशाधि त्वं देव मघवद्भ्यः सुषदः. रातौ स्यामोभयास आ ते यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः.. (२५) ebook converter DEMO Watermarks*