भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 1032, कुल 1855 में से

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पृष्ठ 1032

हे वैश्वानर अग्नि! उस समय तुम्हारे भय से काले रंग की प्रजाएं आपस में बिखरकर भोजन त्यागती हुई भाग गई थीं, जिस समय तुमने दीप्त होकर राजा पुरु के कल्याण के लिए उसके शत्रु के नगरों को जलाया था। (३) तव त्रिधातु पृथिवी उत द्यौर्वैश्वानर व्रतमग्ने सचन्त. त्वं भासा रोदसी आ ततन्थाजस्रेण शोचिषा शोशुचान:.. (४) हे वैश्वानर अग्नि! धरती, आकाश और स्वर्ग-तीनों तुम्हें प्यारा लगने वाला काम करते हैं. तुम नित्य तेज से दीप्तिमान होकर धरती-आकाश को विस्तृत करते हो. (४) त्वामग्ने हरितो वावशाना गिर: सचन्ते धुनयो घृताची:. पतिं कृष्टीनां रथ्यं रयीणां वैश्वानरमुषसां केतुमह्नाम्.. (५) हे वैश्वानर अग्नि! तुम प्रजाओं के स्वामी, धनों के नेता तथा उषाओं व दिवसों के केतु हो. तुम्हारी कामना करते हुए अश्व एवं मानवों की पापरहित तथा हव्ययुक्त स्तुतियां तुम्हारी सेवा करती हैं. (५) त्वे असुर्यं१ वसवो न्यृण्वन्क्रतुं हि ते मित्रमहो जुषन्त. त्वं दस्यूँरोकसो अग्न आज उरु ज्योतिर्जनयन्नार्याय.. (६) हे मित्रों की पूजा करने वाले अग्नि! वसुओं ने तुम में बल धारण किया है एवं तुम्हारे यज्ञ को स्वीकार किया है. तुम यज्ञकर्त्ता के लिए अधिक तेज उत्पन्न करते हुए दस्युओं को उनके स्थान से निकालो. (६) स जायमान: परमे व्योमन्वायोर्न पाथ: परि पासि सद्य:. त्वं भुवना जनयन्नभि क्रन्नपत्याय जातवेदो दशस्यन्.. (७) हे वैश्वानर! परम व्योम में तुम सूर्यरूप से उत्पन्न होकर वायु के समान सबसे पहले सोमरस पीते हो. हे जातवेद अग्नि! तुम जलों को उत्पन्न करते हुए एवं पुत्रवत् पालनीय यजमान की अभिलाषाएं पूरी करते हुए बिजली के रूप में गरजते हो. (७) तामग्ने अस्मे इषमेरयस्व वैश्वानर द्युमतीं जातवेद:. यया राध: पिन्वसि विश्ववार पृथु श्रवो दाशुषे मर्त्याय.. (८) हे जातवेद, सबके द्वारा वरणीय एवं वैश्वानर अग्नि! तुम हमें वही दीप्तिमान अन्न दो, जिसके द्वारा तुम धन की रक्षा करते हो एवं हव्यदाता मनुष्य को विस्तृत कीर्ति देते हो. (८) तं नो अग्ने मघवद्भ्य: पुरुक्षुं रयिं नि वाजं श्रुत्यं युवस्व. वैश्वानर महि न: शर्म यच्छ रुद्रेभिरग्ने वसुभि: सजोषा:.. (९) ebook converter DEMO Watermarks*