ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 1040, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंअपनी महत्ता से सारे पापों को पराजित करने वाले जातवेद अग्नि यज्ञशाला में स्तुति का विषय बनते हैं. वे हमें पापों एवं निंदित कर्मों से बचावें एवं हम हवियुक्त जनों की रक्षा करें. (२) त्वं वरुण उत मित्रो अग्ने त्वां वर्धन्ति मतिभिर्वसिष्ठाः. त्वे वसु सुषणनानि सन्तु यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः.. (३) हे अग्नि! तुम्हीं वरुण और मित्र हो. वसिष्ठगोत्रीय ऋषि स्तुतियों द्वारा तुम्हें बढ़ाते हैं. तुम में रहने वाले धन हमारे लिए सुलभ हों. तुम कल्याणकारी उपायों से हमारी रक्षा करो. (३) सूक्त—१३ देवता—वैश्वानर अग्नि प्राग्नये विश्वशुचे धियन्धेऽसुरघ्ने मन्म धीतिं भरध्वम्. भरे हविर्न बर्हिषि प्रीणानो वैश्वानराय यतये मतीनाम्.. (१) हे मित्रो! सबको उद्दीप्त करने वाले, कर्मों के धारणकर्त्ता एवं असुर विनाशक अग्नि के प्रति सुंदर स्तुतियां बोलो. मैं प्रसन्न होकर कामपूरक वैश्वानर अग्नि को यज्ञ में हवि एवं स्तुति समर्पित करता हूं. (१) त्वमग्ने शोचिषा शोशुचान आ रोदसी अपृणा जायमानः. त्वं देवाँ अभिशस्तेरमुञ्चो वैश्वानर जातवेदो महित्वा.. (२) हे अग्नि! तुमने प्रकाश द्वारा उज्ज्वल बनकर जन्म लेते ही द्यावापृथ्वी को भर दिया था. हे वैश्वानर जातवेद! तुमने अपने महत्त्व से देवों को शत्रुओं से छुड़ाया था. (२) जातो यदग्ने भुवना व्यख्यः पशून्न गोपा इर्यः परिज्मा. वैश्वानर ब्रह्मणे विन्द गातुं यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः.. (३) हे अग्नि! तुम सूर्य से जन्म लेने वाले, सबके स्वामी एवं सब जगह गतिशील हो. गोपाल जैसे पशुओं को देखता है, उसी प्रकार जब तुम रक्षा की दृष्टि से प्राणियों को देखते हो, तब तुम स्तुतियों का फल प्राप्त करो. हे वैश्वानर! तुम कल्याणसाधनों द्वारा हमारी रक्षा करो. (३) सूक्त—१४ देवता—अग्नि समिधा जातवेदसे देवाय देवहूतिभिः. हविर्भिः शुक्रशोचिषे नमस्विनो वयं दाशेमाग्नये.. (१) हम वसिष्ठगोत्रीय ऋषि समिधा द्वारा जातवेद अग्नि की सेवा करते हैं. हम देवस्तुतियों ebook converter DEMO Watermarks*