ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 1070, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंन त्वावाँ अन्यो दिव्यो न पार्थिवो न जातो न जनिष्यते. अश्वायन्तो मघवन्निन्द्र वाजिनो गव्यन्तस्त्वा हवामहे.. (२३) हे धनस्वामी इंद्र! तुम्हारे समान स्वर्ग अथवा धरती में न कोई उत्पन्न हुआ है और न जन्म लेगा. हम घोड़ा, अन्न एवं गो चाहते हुए तुम्हें बुलाते हैं. (२३) अभी षतस्तदा भरेन्द्र ज्यायः कनीयसः. पुरूवसुर्हि मघवन्त्सनादसि भरेभरे च हव्यः.. (२४) हे ज्येष्ठ इंद्र! मुझ कनिष्ठ को वह धन दो. तुम चिरकाल से अधिक धन वाले हो एवं प्रत्येक यज्ञ में बुलाए जाते हो. (२४) परा णुदस्व मघवन्नमित्रानत्सुवेदा नो वसू कृधि. अस्माकं बोध्यविता महाधने भवा वृधः सखीनाम्.. (२५) हे धनस्वामी इंद्र! शत्रुओं को हमसे पराङ्मुख करो एवं हमारे लिए धन को सुलभ बनाओ. तुम हमारे रक्षक बनो एवं हम मित्रों के महान् धन के बढ़ाने वाले बनो. (२५) इन्द्र क्रतुं न आ भर पिता पुत्रेभ्यो यथा. शिक्षा णो अस्मिन्पुरुहूत यामनि जीवा ज्योतिरशीमहि.. (२६) हे इंद्र! हमारे लिए प्रज्ञान लाओ. जैसे पिता पुत्र को देता है, वैसे ही तुम हमें धन दो. हे बहुतों द्वारा बुलाए गए इंद्र! हम यज्ञजीवी प्रतिदिन सूर्य को प्राप्त करें. (२६) मा नो अज्ञाता वृजना दुराध्यो३ माशिवासो अव क्रमुः. त्वया वयं प्रवतः शश्वतीरपोऽति शूर तरामसि.. (२७) हे इंद्र! अज्ञात हिंसक एवं शत्रु लोग हम पर आक्रमण न करें. हे शूर इंद्र! हम नम्र होकर तुम्हारे साथ बहुत से कार्यों में सफलता प्राप्त करें. (२७) सूक्त—३३ देवता—वसिष्ठ एवं उनके पुत्र श्वित्यञ्चो मा दक्षिणतस्कपर्दा धियंजिन्वासो अभि हि प्रमन्दुः. उत्तिष्ठन्वोचे परि बर्हिषो नॄन्न मे दूरादवितवे वसिष्ठाः.. (१) गोरे रंग वाले, यज्ञकर्म पूर्ण करने वाले एवं शिर के दक्षिण भाग में चोटी रखने वाले वसिष्ठपुत्र मुझे प्रसन्न करते हैं. मैं यज्ञ से उठता हुआ उनसे कहता हूं कि हे वसिष्ठपुत्रो! मुझसे दूर मत जाओ. (१) दूरादिन्द्रमनयन्ना सुतेन तिरो वैशन्तमति पान्तमुग्रम्. ebook converter DEMO Watermarks*