ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 1092, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंऋभुऋभुभिरभि वः स्याम विभ्वो विभुभिः शवसा शवांसि. वाजो अस्माँ अवतु वाजसाताविन्द्रेण युजा तरुषेम वृत्रम्.. (२) हे ऋभुओ! हम तुम्हारी सहायता से विस्तृत एवं धनवान् बनें. हम तुम्हारी शक्ति से शत्रुओं को पराजित करें. युद्ध में वाज हमारी रक्षा करें. हम इंद्र को पाकर शत्रुओं से पार पा लेंगे. (२) ते चिद्धि पूर्वीर्भि सन्ति शासा विश्वाँ अर्य उपरताति वन्वन्. इन्द्रो विभ्वाँ ऋभुक्षा वाजो अर्यः शत्रोर्मिंथत्या कृणवन्वि नृम्णम्.. (३) इंद्र एवं ऋभु हमारे शत्रुओं की अनेक सेनाओं को अपनी आज्ञा से मार डालते हैं. वे युद्ध में समस्त शत्रुओं का हनन करते हैं. शत्रुनाशक इंद्र, ऋभुक्षा एवं वाज शत्रु के बल को समाप्त करेंगे. (३) नू देवासो वरिवः कर्तना नो भूत नो विश्वेऽवसे सजोषाः. समस्मे इषं वसवो ददीरन् यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः.. (४) दीप्तिशाली ऋभुओ! हमें आज धन दो. तुम सब समानरूप से प्रसन्न होकर हमारे रक्षक बनो. प्रसिद्ध ऋभु हमें अन्न दें. हे देवो! तुम अपने कल्याणसाधनों द्वारा हमारी सदा रक्षा करो. (४) सूक्त—४९ देवता—जल समुद्रज्येष्ठाः सलिलस्य मध्यात्पुनाना यन्त्यनिविशमानाः. इन्द्रो या वज्री वृषभो रराद ता आपो देवीरिह मामवन्तु.. (१) समुद्र जिन में बड़ा है, ऐसे जल सबको शुद्ध करते हैं, सदा गतिशील हैं एवं अंतरिक्ष के मध्य से जाते हैं. वज्रधारी एवं अभिलाषापूरक इंद्र ने जिन्हें रुका होने पर स्वच्छंद किया था, वे जल देवता इस स्थान में हमारी रक्षा करें. (१) या आपो दिव्या उत वा स्रवन्ति खनित्रिमा उत वाप याः स्वयञ्जाः. समुद्रार्था याः शुचयः पावकास्ता आपो देवीरिह मामवन्तु.. (२) जो जल अंतरिक्ष से उत्पन्न होते हैं, नदी के रूप में बहते हैं, जो खोद कर निकाले जाते हैं अथवा जो अपने आप उत्पन्न होकर सागर की ओर गति करते हैं, जो दीप्तियुक्त एवं पवित्र करने वाले हैं, वे देवीरूप जल यहां हमारी रक्षा करें. (२) यासां राजा वरुणो याति मध्ये सत्यानृते अवपश्यञ्जनानाम्. मधुश्चुतः शुचयो याः पावकास्ता आपो देवीरिह मामवन्तु.. (३) ebook converter DEMO Watermarks*