ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 1100, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंहे मरुतो! यज्ञशाला में बैठा हुआ होता तुम्हारे सब जगह जाने वाले दान की प्रशंसा करता हुआ तुम्हें बार-बार बुलाता है. हे अभिलाषापूरक मरुतो! जो यज्ञकर्त्ता यजमान का रक्षक है, वह होता मायारहित होकर स्तोत्रों द्वारा तुम्हारी प्रशंसा करता है. (१८) इमे तुरं मरुतो रामयन्तीमे सहः सहस आ नमन्ति. इमे शंसं वनुष्यतो नि पान्ति गुरु द्वेषो अररुषे दधन्ति.. (१९) ये मरुद्गण शीघ्रतापूर्वक यज्ञ करने वाले यजमान को प्रसन्न करते हैं एवं शक्तिशाली लोगों को शक्ति द्वारा झुकाते हैं. ये स्तोता को हिंसकों से बचाते हैं, पर हव्य न देने वाले मनुष्य के प्रति बहुत द्वेष रखते हैं. (१९) इमे रध्रं चिन्मरुतो जुनन्ति भूमिं चिद्यथा वसवो जुषन्त. अप बाधध्वं वृषणस्तमांसि धत्त विश्वं तनयं तोकमस्मे.. (२०) ये मरुद्गण धनी और निर्धन दोनों को प्रेरणा देते हैं. हे वासदाता एवं कामपूरक मरुतो! देवगण जैसा चाहते हैं, उसी के अनुसार तुम अंधकार मिटाओ तथा हमें अधिक मात्रा में पुत्र- पौत्र दो. (२०) मा वो दात्रान्मरुतो निरराम मा पश्चादघ्म रथ्यो विभागे. आ नः स्पार्हं भजतना वसव्ये३ यदीं सुजातं वृषणो वो अस्ति.. (२१) हे मरुतो! हम तुम्हारे दान की सीमा से बाहर न रहें. हे रथस्वामी मरुतो! धन बांटते समय हमें पीछे मत रखना एवं चाहने योग्य धनों का स्वामी बनाना. हे अभिलाषापूरक मरुतो! तुम हमें अपने शोभन उत्पत्ति वाले धन का भागी बनाना, (२१) सं यद्धनन्त मन्युभिर्जनासः शूरा यह्वीष्वोषधीषु विक्षु. अध स्मा नो मरुतो रुद्रियासस्त्रातारो भूत पृतनास्वर्यः.. (२२) हे रुद्रपुत्र मरुतो! जिस समय शूर लोग युद्ध में अनेक ओषधियों एवं प्रजा को जीतने के लिए क्रोधयुक्त होते हैं, उस समय तुम शत्रुओं से हमारी रक्षा करना. (२२) भूरि चक्र मरुतः पित्र्याण्युक्थानि या वः शस्यन्ते पुरा चित्. मरुद्भिरुग्रः पृतनासु साळ्हा मरुद्भिरित्सनिता वाजमर्वा.. (२३) हे मरुतो! तुमने हमारे पितरों के कल्याण के लिए बहुत से काम किए थे. तुम्हारे जिन प्राचीन कार्यों की प्रशंसा की जाती है, उन्हें भी तुम्हीं ने किया था. तुम्हारी सहायता से तेजस्वी लोग युद्ध में शत्रुओं को हराते हैं एवं स्तोता अन्न प्राप्त करता है. (२३) अस्मे वीरो मरुतः शुष्यस्त्वस्तु जनानां यो असुरो विधर्ता. अपो येन सुक्षितये तरेमाध स्वमोको अभि वः स्याम.. (२४) ebook converter DEMO Watermarks*