भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 1108, कुल 1855 में से

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पृष्ठ 1108

प्रोरौर्मित्रावरुणा पृथिव्याः प्र दिव ऋष्वाद्वृहतः सुदानू. स्पशो दधाथे ओषधीषु विश्वध्वग्यतो अनिमिषं रक्षमाणा.. (३) हे मित्र व वरुण! तुमने विस्तृत पृथ्वी एवं गुण तथा रूप के कारण विशाल अंतरिक्ष की परिक्रमा की है. हे शोभनदान वाले देवी! तुम दोनों सत्य पर चलने वाले का सदा पालन करते हुए ओषधियों एवं प्रजा के रूप धारण करते हो. (३) शंसा मित्रस्य वरुणस्य कम शुष्मो रोदसी बद्बधे महित्वा. अयन्मासा अयज्वनामवीराः प्र यज्ञमन्मा वृजनं तिराते.. (४) हे ऋषि! तुम मित्र एवं वरुण के तेज की प्रशंसा करो. उनकी शक्ति अपने महत्त्व के द्वारा द्यावा-पृथिवी को अलग-अलग धारण करती है. यज्ञ न करने वाले के मास बिना पुत्रों के बीतें. यज्ञ के प्रति उनकी बुद्धि बल बढ़ावे. (४) अमूरा विश्वा वृषणाविमा वां न यासु चित्रं ददृशे न यक्षम्. द्रुहः सचन्ते अनृता जनानां न वां निण्यान्यचिते अभूवन्.. (५) हे मूढ़तारहित, व्यापक एवं अभिलाषापूरक मित्र व वरुण! तुम्हारी स्तुतियों में आश्चर्य एवं आदर दिखाई नहीं देता. अर्थात् तुम्हारी स्तुतियां सच्ची हैं. लोगों की झूठी स्तुति तुम्हारे शत्रु स्वीकार करते हैं. तुम्हारे प्रति किए गए स्तोत्र रहस्यपूर्ण होते हुए भी अज्ञान के कारण न बनें. (५) समु वां यज्ञं महयं नमोभिर्हुवे वां मित्रावरुणा सबाधः. प्र वां मन्मान्युचसे नवानि कृतानि ब्रह्म जुजुषन्निमानि.. (६) हे मित्र व वरुण! मैं स्तुतियों के द्वारा तुम्हारे यज्ञ की पूजा करता हूं एवं बाधा के निवारण हेतु तुम्हें बुलाता हूं. मैंने तुम्हारे लिए नए स्तोत्र बनाए हैं. मेरे द्वारा एकत्रित स्तुतियां तुम्हें प्रसन्न करें. (६) इयं देव पुरोहितिर्युवभ्यां यज्ञेषु मित्रावरुणावकारि. विश्वानि दुर्गा पिपृतं तिरो नो यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः.. (७) हे मित्र व वरुण देव! तुम्हारे यज्ञ में यह पूजारूपी स्तुति की गई है. इसे स्वीकार करके हमारे सभी दुःखों को नष्ट करो एवं अपने कल्याणसाधनों द्वारा हमारी सदा रक्षा करो. (७) सूक्त—६२ देवता—मित्र व वरुण उत्सूर्यो बृहदर्चींष्यश्रेत्पुरु विश्वा जनिम मानुषाणाम्. समो दिवा ददृशे रोचमानः क्रत्वा कृतः सुकृतः कर्तृभिर्भूत्.. (१) ebook converter DEMO Watermarks*