ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 1210, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंउन्हीं इंद्र की शक्ति से शक्ति पाने हेतु सारा संसार दीप्त होता है. (२४) यदिन्द्र पृतनाज्ये देवास्त्वा दधिरे पुरः. आदित्ते हर्यता हरी ववक्षतुः.. (२५) हे इंद्र! जब देवों ने तुम्हें संग्राम में स्वामी के रूप में आगे किया था, उसी समय सुंदर घोड़ों ने तुम्हें ढोया था. (२५) यदा वृत्रं नदीवृतं शवसा वज्रिन्नवधीः. आदित्ते हर्यता हरी ववक्षतुः.. (२६) हे वज्रधारी इंद्र! तुमने जल को रोकने वाले वृत्र को जिस समय मारा था, उसी समय तुम्हारे सुंदर घोड़ों ने तुम्हें ढोया था. (२६) यदा ते विष्णुरोजसा त्रीणि पदा विचक्रमे. आदित्ते हर्यता हरी ववक्षतुः.. (२७) हे इंद्र! तुम्हारे छोटे भाई विष्णु ने जिस समय अपने बल से तीन लोकों को अपने तीन कदमों से नापा था, उसी समय तुम्हारे सुंदर घोड़ों ने तुम्हें ढोया था. (२७) यदा ते हर्यता हरी वावृधाते दिवेदिवे. आदित्ते विश्वा भुवनानि येमिरे.. (२८) हे इंद्र! तुम्हारे सुंदर घोड़े जब प्रतिदिन बढ़े थे, उसी के बाद तुमने सारे संसार को नियम में बांधा था. (२८) यदा ते मारुतीर्विशस्तुभ्यमिन्द्र नियेमिरे. आदित्ते विश्वा भुवनानि येमिरे.. (२९) हे इंद्र! जब तुम्हारी मरुद्गणरूपी प्रजा तुम्हारे लिए सब प्राणियों को नियम में बांधती हैं, उसी के बाद तुम सारे विश्व को नियमित करते हो. (२९) यदा सूर्यममुं दिवि शुक्रं ज्योतिरधारयः. आदित्ते विश्वा भुवनानि येमिरे.. (३०) हे इंद्र! तुम उज्ज्वल प्रकाश वाले सूर्य को जिस समय द्युलोक में धारण करते हो, उसी समय सारे संसार को नियमों में बांधते हो. (३०) इमां त इन्द्र सुष्टुतिं विप्र इयर्ति धीतिभिः. जामिं पदेव पिप्रतीं प्राध्वरे.. (३१) हे इंद्र! बुद्धिमान् स्तोता यज्ञ में प्रसन्नता देने वाली शोभन स्तुति अपने सेवाकार्यों द्वारा इस प्रकार तुम्हारे पास भेजता है जिस प्रकार लोग अपने बंधु उत्तम स्थान में भेजते हैं. (३१) यदस्य धामनि प्रिय समीचीनासो अस्वरन्. नाभा यज्ञस्य दोहना प्राध्वरे.. (३२) हे इंद्र! यज्ञ में तुम्हारे तेज को प्रसन्न करने के लिए स्तोता एकत्र होकर जब ऊंचे स्वर से स्तुति बोलते हैं, उस समय तुम धरती की नाभिरूप यज्ञ की वेदी पर धन दो. (३२) सुवीर्यं स्वश्व्यं सुगव्यमिन्द्र दद्धि नः. होतेव पूर्वचित्तये प्राध्वरे.. (३३) ebook converter DEMO Watermarks*