ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 1305, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंवह मुझ आप्त्यत्रित के कल्याण के लिए दूर करो. तुम्हारी रक्षा उपद्रवरहित एवं शोभन है. (१४) निष्कं वा घा कृणवते स्रजं वा दुहितर्दिवः. त्रिते दुष्वप्न्यं सर्वमाप्त्ये परि दद्मस्यनेहसो व ऊतयः सुऊतयो व ऊतयः.. (१५) हे स्वर्ग की पुत्री उषा! आभरण बनाने वाले सुनार अथवा माला बनाने वाले का जो दुःख है वह मुझ आप्त्यत्रित के पास से दूर चला जावे. तुम्हारी रक्षा उपद्रवरहित एवं शोभन है. (१५) तदन्नाय तदपसे तं भागमुपसेदुषे. त्रिताय च द्विताय चोषो दुष्वप्न्यं वहानेहसो व ऊतयः सुऊतयो व ऊतयः.. (१६) हे उषा! मुझ आप्त्यत्रित द्वारा स्वप्न में मधु, खीर आदि भोजन पाने पर दुःस्वप्न का कष्ट दूर करो. तुम्हारी रक्षा उपद्रवरहित एवं शोभन है. (१६) यथा कलां यथा शफं यथ ऋणं संनयामसि. एवा दुष्वप्न्यं सर्वमाप्त्ये सं नयामस्यनेहसो व ऊतयः सुऊतयो व ऊतयः.. (१७) हे उषा! जिस प्रकार यज्ञ में बलि दिए गए पशु के हृदय, खुर, सींग आदि अंग क्रम से लिए जाते हैं अथवा जिस प्रकार ऋण धीरे-धीरे दिया जाता है, उसी प्रकार आप्त्यत्रित के सभी बुरे स्थान धीरे-धीरे दूर करो. तुम्हारी रक्षा उपद्रवरहित एवं शोभन है. (१७) अजैष्माद्यासनाम चाभूमानागसो वयम्. उषो यस्माद्दुष्वप्न्यादभैष्माप तदुच्छत्वनेहसो व ऊतयः सुऊतयो व ऊतयः.. (१८) हे देवी उषा! आज हम जीतेंगे एवं पापरहित होंगे. आज हम सुख प्राप्त करेंगे. हम जिस बुरे स्वप्न से डर रहे हैं, उसके पाप से हमें बचाओ. तुम्हारी रक्षा उपद्रवरहित एवं शोभन है. (१८) सूक्त—४८ देवता—सोम स्वादोर्भक्षि वयसः सुमेधाः स्वाध्यो वरिवोवित्तस्य. विश्वे यं देवा उत मर्त्यासो मधु ब्रुवन्तो अभि सञ्चरन्ति.. (१) शोभन-बुद्धि एवं अध्ययन से युक्त मैं अत्यंत पूजा प्राप्त करने वाले एवं स्वादिष्ट अन्न का भक्षण कर सकूं. विश्वेदेव एवं सभी मनुष्य उस अन्न को मधु कहते हुए घूमते हैं. (१) अन्तश्च प्रागा अदितिर्भवास्यवयाता हरसो दैव्यस्य. इन्दविन्द्रस्य सख्यं जुषाणः श्रौष्टीव धुरमनु राय ऋध्याः.. (२) ebook converter DEMO Watermarks*