ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 1311, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंअग्निं हितप्रयसः शश्वतीष्वा होतारं चर्षणीनाम्.. (१७) हे यजमानो! कुश छिन्न करने वाले एवं हव्य डालने वाले हम तुम्हारे लिए अग्नि को बुलाते हैं. अग्नि सर्वदा घर में वर्तमान, होता एवं सब प्रजाओं के यज्ञकर्मों को धारण करने वाले हैं. (१७) केतेन शर्मन्त्सचते सुशामण्यग्ने तुभ्यं चिकित्वना. इषण्यया नः पुरुरूपमा भर वाजं नेदिष्ठमूतये.. (१८) हे अग्नि! यजमान शोभन सामवेद वाले एवं सुखसाधन यज्ञ में बुद्धिमान् मनुष्यों से मिलकर स्तुतियों द्वारा प्रशंसा करते हैं. तुम हमारी रक्षा के लिए अपनी इच्छा से समीप में वर्तमान एवं अनेक रूपों वाले अन्न लाओ. (१८) अग्ने जरितर्विशपतिस्तेपानो देव रक्षसः. अप्रोषिवान्गृहपतिर्महाँ असि दिवस्पायुर्दुरोणयुः.. (१९) हे स्तुति योग्य अग्नि देव! तुम प्रजापालक, राक्षसों को कष्ट देने वाले. यजमान के घर के रक्षक, गृहस्वामी, महान् एवं द्युलोक का पालन करने वाले हो. तुम यजमान के घर में सदा रहते हो. (१९) मा नो रक्ष आ वेशीदाघृणीवसो मा यातुर्यातुमावताम्. परोगव्यूत्यनिरामप क्षुधमग्ने सेध रक्षस्विनः.. (२०) हे दीप्तिरूपी धन वाले अग्नि! हमारे भीतर राक्षस एवं पीड़ा का प्रवेश न हो. अन्नाभाव एवं बलवान् राक्षसों को हमसे दूर रखो. (२०) सूक्त—५० देवता—इंद्र उभयं शृणवच्च न इन्द्रो अर्वागिदं वचः. सत्राच्या मघवा सोमपीतये धिया शविष्ठ आ गमत्.. (१) इंद्र हमारे दोनों प्रकार के वचनों को शीघ्र सुनें. इंद्र हमारे यज्ञकर्म के साथ रहकर धनवान् तथा शक्तिशाली हों एवं सोमरस पीने के लिए आवें. (१) तं हि स्वराजं वृषभं तमोजसे धिषणे निष्टतक्षतुः. उतोपमानां प्रथमो नि षीदसि सोमकामं हि ते मनः.. (२) द्यावा-पृथिवी ने स्वयं सुशोभित एवं अभिलाषापूरक इंद्र का संस्कार तेज पाने के लिए किया था. हे इंद्र! तुम अपने समान देवों में प्रमुख बनकर यज्ञवेदी पर बैठो. तुम्हारा मन सोमरस का इच्छुक है. (२) ebook converter DEMO Watermarks*