ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 1382, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंश्रायन्तइव सूर्य्यं विश्वेदिन्द्रस्य भक्षत. वसूनि जाते जनमान ओजसा प्रति भागं न दीधिम.. (३) हे सेवको! सूर्य की किरणें जिस प्रकार सूर्य से मिली रहती हैं, उसी प्रकार तुम सूर्य के सभी धनों का भोग करो. इंद्र ने शक्ति द्वारा धन उत्पन्न किए हैं. भविष्य में भी वह धन उत्पन्न करेंगे. हम उनका धन पैतृक भाग के समान लेंगे. (३) अनर्शरातिं वसुदामुप स्तुहि भद्रा इन्द्रस्य रातयः. सो अस्य कामं विधतो न रोषति मनो दानाय चोदयन्.. (४) हे स्तोता! इंद्र की स्तुति करो. वह पापरहित को धन देते हैं एवं दानशील हैं. इंद्र का दान कल्याणकारी है. इंद्र यजमान के लिए धन देने को अपने मन को प्रेरित करते हैं, उसकी अभिलाषाओं में बाधा नहीं डालते. (४) त्वमिन्द्र प्रतूर्तिष्वभि विश्वा असि स्पृधः. अशास्तिहा जनिता विश्वतूरसि त्वं तूर्य तरुष्यतः.. (५) हे इंद्र । तुम युद्धों में सभी शत्रुसेनाओं को पराजित करते हो. हे शत्रुबाधक इंद्र! तुम दैत्यहंता, असुरों के शत्रुओं को उत्पन्न करने वाले एवं समस्त शत्रुओं के हिंसक हो. (५) अनु ते शुष्मं तुरयन्तमियतूः क्षोणी शिशुं मातरा. विश्वास्ते स्पृधः श्रथयन्त मन्यवे वृत्रं यदिन्द्र तूर्वसि.. (६) हे इंद्र! जिस प्रकार माता पुत्र के पीछे चलती है, उसी प्रकार द्यावा-पृथिवी तुम्हारी शत्रुनाशक बल के पीछे चलती हैं. हे इंद्र! जब तुम वृत्र का वध करते हो, तब तुम्हारे क्रोध को देखकर सभी सेनाएं छिन्न होती हैं. (६) इत ऊती वो अजरं प्रहेतारमप्रहितम्. आशुं जेतारं हेतारं रथीतममतूर्तं तुग्र्यावृधम्.. (७) हे सेवको! तुम अपनी रक्षा के लिए जरारहित, शत्रुओं को भगाने वाले, किसी से प्रभावित न होने वाले, शीघ्रगामी, शत्रुजयी व जल को बढ़ाने वाले इंद्र को आगे करो. (७) इष्कर्तारमनिष्कृतं सहस्कृतं शतमूर्तिं शतक्रतुम्. समानमिन्द्रमवसे हवामहे वसवानं वसूजुवम्.. (८) हम शत्रुविनाशक, दूसरों द्वारा नष्ट न होने वाले, अनेक रक्षासाधनों से युक्त, अनेक कर्मों वाले, सबके प्रति समान, धनों को घेरने वाले एवं यजमानों के पास धन भेजने वाले इंद्र को अपनी रक्षा के लिए बुलाते हैं. (८) ebook converter DEMO Watermarks*