ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 1384, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंपारावतं यत्पुरुसम्भृतं वस्वपावृणोः शरभाय ऋषिबन्धवे.. (६) हे धनस्वामी इंद्र! तुमने यज्ञों में सोमरस निचोड़ने वालों के लिए जो कुछ किया है, वे अनंत कर्म कहने योग्य हैं. परावत द्वारा एकत्र किया गया जो बहुत सा धन था, उसे तुमने ऋषियों के मित्र शरभ के लिए प्रकट किया था. (६) प्र नूनं धावता पृथङ्नेह यो वो अवावरीत्. नि षीं वृत्रस्य मर्मणि वज्रमिन्द्रो अपीपतत्.. (७) इस समय जो शत्रु दौड़ता है, जो यहां अलग स्थित नहीं है एवं जो तुम्हें आवृत नहीं करता, उस शत्रु के मर्मस्थान में इंद्र अपना वज्र मारते हैं. (७) मनोजवा अयमान आयसीमतरतत्पुरम्. दिवं सुपर्णो गत्वाय सोमं वज्रिण आभरत्.. (८) मन के समान वेगवाले गरुड़ चलते हुए लोगों से बनी नगरियों को पार कर गए. वे स्वर्ग में जाकर वज्रधारी इंद्र के लिए सोम लाए. (८) समुद्रे अन्तः शयत उदना वज्रो अभीवृतः. भरन्त्यस्मै संयतः पुरःप्रस्रवणा बलिम्.. (९) जो वज्र समुद्र के बीच में सोता है एवं जो जल से घिरा हुआ है, संग्राम में आगे चलने वाले शत्रु उसी वज्र का उपहार पाते हैं. (९) यद्वाग् वदन्त्यविचेतनानि राष्ट्री देवानां निषसाद मन्द्रा. चतस्र ऊर्जं दुदुहे पयांसि क्व स्विदस्याः परमं जगाम.. (१०) देवों को प्रसन्न करने वाली तेजपूर्ण वाणी न जाने हुए अर्थों को प्रकट करती हुई जिस समय यज्ञ में स्थित होती है, उस समय चारों दिशाएं इसके लिए अन्न और जल दुहती हैं. पता नहीं इसका श्रेष्ठ धन कहां जाता है? (१०) देवीं वाचमजनयन्त देवास्तां विश्वरूपाः पशवो वदन्ति. सा नो मन्द्रेषमूर्जं दुहाना धेनुर्वागस्मानुप सुष्टुतैतु.. (११) देवगण जिस दीप्ति वाली मध्यमा वाणी को उत्पन्न करते हैं, उसीको सब पशु बोलते हैं. प्रसन्न करने वाली वह वाणी अन्न एवं रस बरसाती हुई हमारे द्वारा स्तुत होकर गाय के समान हमारे पास आए. (११) सखे विष्णो वितरं वि क्रमस्व द्यौर्देहि लोकं वज्राय विष्कभे. हनाव वृत्रं रिणचाव सिन्धूनिन्द्रस्य यन्तु प्रसवे विसृष्टाः.. (१२) ebook converter DEMO Watermarks*