भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 1390, कुल 1855 में से

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पृष्ठ 1390

साधनहीन मैं तुम्हें धारण करता हूं. (१९) यदग्ने कानि कानि चिदा ते दारूणि दध्मसि. ता जुषस्व यविष्ठ्य.. (२०) हे युवा-अग्नि! तुम्हारे लिए मैं जो भी कुछ लकड़ियां धारण करता हूं, तुम उन्हें स्वीकार करो. (२०) यदत्त्युपजिह्विका यद्वम्रो अतिसर्पति. सर्वं तदस्तु ते घृतम्.. (२१) हे अग्नि! जिन काष्ठों को तुम्हारी ज्वाला खाती है एवं जिनको लांघकर जाती है, वह सब काठ तुम्हारे लिए घी के समान हों. (२१) अग्निमिन्धानो मनसा धियं सचेत मर्त्यः. अग्निमीधे विवस्वभिः.. (२२) मनुष्य लकड़ियों की सहायता से अग्नि को प्रज्वलित करता हुआ मन की श्रद्धा के साथ यज्ञकर्म करता है. वह ऋत्विजों द्वारा अग्नि को बढ़ाता है. (२२) सूक्त—९२ देवता—मरुद्गण व अग्नि अदर्शि गातुवित्तमो यस्मिन्व्रतान्यादधुः. उपो षु जातमार्थस्य वर्धनमग्निं नक्षन्त नो गिरः.. (१) यजमान जिन अग्नि में यज्ञकर्मों का आह्वान करता है, वे ही मार्ग को जानने वालों में श्रेष्ठ उत्पन्न हुए हैं. आर्यों को बढ़ाने वाले एवं उत्पन्न अग्नि के समीप हमारी स्तुतियां जाती हैं. (१) प्र दैवोदासो अग्निर्दैवाँ अच्छा न मज्मना. अनु मातरं पृथिवीं वि वावृते तस्थौ नाकस्य सानवि.. (२) दिवोदास के द्वारा बुलाए हुए अग्नि ने पृथ्वी माता के सामने यज्ञ में देवों के लिए हव्य वहन नहीं किया, क्योंकि दिवोदास ने अग्नि को बलपूर्वक बुलाया था. अग्नि स्वर्ग के ऊंचे स्थान पर ही रहे. (२) यस्माद्रेजन्त कृष्टयश्चर्कृत्यानि कृण्वतः. सहस्रसां मेधसाताविव त्मनाऽग्निं धीभिः सपर्यत.. (३) हे मनुष्यो! कर्त्तव्य यज्ञकर्म करने वाले लोगों से अन्य प्रजाएं कांपती हैं, इसलिए हजारों संपत्तियों के देने वाले अग्नि की सेवा तुम स्वयं अपने कर्मों द्वारा करो. (३) ebook converter DEMO Watermarks*