ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 1398, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंसूक्त—५ देवता—आप्री समिद्धो विश्वतस्पतिः पवमानो वि राजति. प्रीणन् वृषा कनिक्रदत्.. (१) भली प्रकार दीप्ति वाले, सबके स्वामी एवं अभिलाषापूरक सोम शब्द करते हैं एवं देवों को प्रसन्न करते हुए विराजमान हैं. (१) तनूनपात् पवमानः शृङ्गे शिशानो अर्षति. अन्तरिक्षेण रारजत्.. (२) जल के नाती पवमान सोम ऊंचे स्थान में बढ़ते हुए अंतरिक्ष से कलश की ओर बढ़ते हैं. (२) ईळेन्यः पवमानो रयिर्वि राजति द्युमान्. मधोर्धाराभिरोजसा.. (३) स्तुतियोग्य, अभीष्टदाता और दीप्तिशाली सोम जल की धाराओं के साथ गिरते हुए अपने तेज से सुशोभित होते हैं. (३) बर्हिः प्राचीनमोजसा पवमानः स्तृणन् हरिः. देवेषु देव ईयते.. (४) हरे रंग के एवं दीप्तिशाली सोम यज्ञों में पूर्व की ओर कुश बिछाते हुए अपने तेजरूपी बल से जाते हैं. (४) उदातैर्जिहते बृहद् द्वारो देवीर्हिरण्ययीः. पवमानेन सुष्टुताः.. (५) स्वर्णमयी द्वारदेवियां पवमान सोम के साथ स्तुत होकर विस्तृत दिशाओं में ऊपर की ओर चढ़ती हैं. (५) सुशिल्पे बृहती मही पवमानो वृषण्यति. नक्तोषासा न दर्शते.. (६) इस समय पवमान सोम शोभनरूप वाली, विशाल, महान् और दर्शन करने योग्य दिवस निशा की अभिलाषा करते हैं. (६) उभा देवा नृचक्षसा होतारा दैव्या हुवे. पवमान इन्द्रो वृषा.. (७) मैं दोनों प्रकार के देवों—मानवद्रष्टा और देवों का होम करने वालों को बुलाता हूं. पवमान सोम दीप्त और अभिलाषापूरक हैं. (७) भारती पवमानस्य सरस्वतीळा मही. इमं नो यज्ञमा गमन्तिस्रो देवीः सुपेशसः.. (८) हमारे सोम-संबंधी यज्ञ में भारती, सरस्वती एवं महती इडा नामक तीन शोभनरूप वाली देवियां आवें. (८)