ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 1425, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंरायः समुद्रांश्चतुरोऽस्मभ्यं सोम विश्वतः. आ पवस्व सहस्रिणः.. (६) हे सोम! चारों समुद्रों से घिरी धनपूर्ण धरती को चारों ओर से हमें दो. तुम हमारी हजारों अभिलाषाएं पूरी करो. (६) सूक्त—३४ देवता—सोम प्र सुवानो धारया तनेन्दुहिंन्वानो अर्षति. रुजद् दृळ्हा व्योजसा.. (१) निचुड़ते हुए सोम अध्वर्यु की प्रेरणा से दशापवित्र में जाते हैं तथा शत्रुओं की दृढ़ नगरियों को शिथिल बनाते हैं. (१) सुत इन्द्राय वायवे वरुणाय मरुद्भ्यः. सोमो अर्षति विष्णवे.. (२) निचोड़े हुए सोम इंद्र, वायु, वरुण, मरुद्गण एवं विष्णु के पास जाते हैं. (२) वृषाणं वृषभिर्यतं सुन्वन्ति सोममद्रिभिः. दुहन्ति शक्मना पयः.. (३) अध्वर्यु आदि रस बरसाने वाले एवं हाथ में पकड़े हुए सोमरस को निचोड़ने वाले पत्थरों द्वारा दुहते हैं. वे कर्मरूपी बल द्वारा सोमरसरूपी दूध दुहते हैं. (३) भुवत्त्रितस्य मर्ज्यो भुवदिन्द्राय मत्सरः. सं रूपैरज्यते हरिः.. (४) त्रित ऋषि का यह नशीला सोम अपने एवं इंद्र के पीने के लिए शुद्ध हो रहा है. हरे रंग का सोम दूध आदि के साथ मिलाया जाता है. (४) अभीमृतस्य विष्टपं दुहते पृश्निमातरः. चारु प्रियतमं हविः.. (५) पृश्नि के पुत्र मरुद्गण इस यज्ञ के स्थान, इंद्र आदि के प्रिय, होम के साधन व मनोहर सोम को दुहते हैं. (५) समेनमहुता इमा गिरो अर्षन्ति सस्रुतः. धेनूर्वाश्रो अवीवशत्.. (६) हमारी सरल स्तुतियां चलती हुई सोम के साथ मिलती हैं. शब्द करते हुए सोम उन प्रसन्न करने वाली स्तुतियों की अभिलाषा करते हैं. (६) सूक्त—३५ देवता—सोम आ नः पवस्व धारया पवमान रयिं पृथुम्. यया ज्योतिर्विदासि नः.. (१) हे निचुड़ते हुए सोम! तुम धारा के रूप में हमारे चारों ओर गिरो तथा अपनी धारा के ebook converter DEMO Watermarks*