ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 1435, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंदस उंगलियां मसलने योग्य, टपकते हुए एवं नशीले इस सोम को इंद्र के निमित्त पवित्र करती हैं. (६) सूक्त—४७ देवता—पवमान सोम अया सोमः सुकृत्यया महश्चिद्भ्यवर्धत. मन्दान उद्वृषायते.. (१) निचोड़ने की इस शोभन क्रिया द्वारा सोम देवों के लिए वृद्धि को प्राप्त हुए हैं एवं प्रसन्न होकर बैल के समान शब्द करते हैं. (१) कृतानीदस्य कत्वा चेतन्ते दस्युतहंणा. ऋणा च धृष्णुश्चयते.. (२) इन सोम के असुरनाशन आदि कर्म हमने किए हैं. शत्रुओं को हराने वाले सोम यजमानों के ऋण भी चुकाते हैं. (२) आत्सोम इन्द्रियो रसो वज्रः सहस्रसा भुवत्. उक्थं यदस्य जायते.. (३) जिस समय इंद्रसंबंधी मंत्र बोले जाते हैं, तभी इंद्र का प्रिय करने वाले, बलवान् व वज्र के समान हिंसाशून्य सोम हमारे लिए असीमित धन देते हैं. (३) स्वयं कविर्विधर्तरि विप्राय रत्नमिच्छति. यदी मर्मृज्यते धियः.. (४) जब क्रांत कर्म वाले सोम उंगलियों द्वारा शुद्ध किए जाते हैं, तभी वे मेधावी स्तोता को अभिलाषापूर्वक इंद्र से रमणीय धन दिलाना चाहते हैं. (४) सिषासतू रयीणां वाजेष्वर्वतामिव. भरेषु जिग्युषामसि.. (५) हे सोम! संग्राम में जाने वाले घोड़े को जिस प्रकार घास दी जाती है, उसी प्रकार तुम संग्राम में जीतने वालों को शत्रुओं के धन देते हो. (५) सूक्त—४८ देवता—पवमान सोम तं त्वा नृम्णानि बिभ्रतं सधस्थेषु महो दिवः. चारुं सुकृत्ययेमहे.. (१) हे महान् द्युलोक के समान स्थानों में स्थित, हमारे लिए धन एवं कल्याण धारण करने वाले एवं निचुड़ते हुए सोम! हम शोभन क्रिया द्वारा तुमसे धन मांगते हैं. (१) संवृक्तधृष्णुमुक्थ्यं महामहिव्रतं मदम्. शतं पुरो रुरुक्षणिम्.. (२) हे शत्रुओं के नाशक, प्रशंसा के योग्य, पूजा के योग्य, बहुत से कर्म करने वाले, नशीले ebook converter DEMO Watermarks*