ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 1459, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंका मार्ग बताओ. (१३) आ कलशा अनूषतेन्दो धाराभिरोजसा. एन्द्रस्य पीतये विश.. (१४) हे टपकने वाले सोम! तुझ ओजस्वी की निरंतर धाराओं से युक्त द्रोणकलश की स्तोता स्तुति करते हैं. तुम इंद्र के पीने के लिए द्रोणकलश में प्रवेश करो. (१४) यस्य ते मद्यं रसं तीव्रं दुहन्त्यद्रिभिः. स पवस्वाभिमातिहा.. (१५) हे सोम! तुम्हारे जल्दी नशा करने वाले जिस रस को अध्वर्यु पत्थरों की सहायता से दुहते हैं, तुम शत्रुओं का हनन करते हुए उसी रस को बरसाओ. (१५) राजा मेधाभिरीयते पवमानो मनावधि. अन्तरिक्षेण यातवे.. (१६) जिस समय मनुष्य यज्ञ करते हैं, उस समय राजा सोम अंतरिक्ष मार्ग से द्रोणकलश में जाते हुए प्रशंसित होते हैं. (१६) आ न इन्दो शतग्विनं गवां पोषं स्वश्व्यम्. वहा भगत्तिमूतये.. (१७) हे दीप्तिशाली सोम! तुम सौ गायों वाला, गायों को पुष्ट करने वाला व शोभन अश्वों से युक्त धन हमारी रक्षा के लिए दो. (१७) आ नः सोम सहो जुवो रूपं न वर्चसे भर. सुष्वाणो देववीतये.. (१८) हे देवों की प्रसन्नता के लिए निचुड़ते हुए सोम! हमें सर्वत्र गमनयोग्य बल एवं सर्वत्र प्रकाश के नए रूप दो. (१८) अर्षा सोम द्युमत्तमोऽभि द्रोणानि रोरुवत्. सीदञ्छ्येनो न योनिमा.. (१९) हे सोम! जिस प्रकार बाज पक्षी शब्द करता हुआ अपने घोंसले में आता है, उसी प्रकार तुम दीप्तिशाली बनकर द्रोणकलश में जाते हो. (१९) अप्सा इन्द्राय वायवे वरुणाय मरुद्भ्यः. सोमो अर्षति विष्णवे.. (२०) जल में मिलने वाले सोम इंद्र, वायु, वरुण, विष्णु एवं मरुद्गणों के लिए बहते हैं. (२०) इषं तोकाय नो दधदस्मभ्यं सोम विश्वतः. आ पवस्व सहस्रिणम्.. (२१) हे सोम! तुम हमारे पुत्र के लिए अन्न देते हुए हमारे लिए सब ओर से हजारों तरह का धन बरसाओ. (२१) ये सोमासः परावति ये अर्वावति सुन्विरे. ये वादः शर्यणावति.. (२२) ebook converter DEMO Watermarks*