भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 1470, कुल 1855 में से

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पृष्ठ 1470

द्रोणकलश में जाते हैं व जलों, पत्थरों एवं दूध से सुशोभित होते हैं. निचुड़े हुए एवं छने हुए सोम स्तोताओं को प्रिय एवं वरण करने योग्य धन देते हैं. (९) एवा नः सोम परिषिच्यमानो वयो दधच्चित्रतमं पवस्व. अद्वेषे द्यावापृथिवी हुवेम देवा धत्त रयिमस्मे सुवीरम्.. (१०) हे दान करते हुए एवं जलों द्वारा चारों ओर से सींचे जाते हुए सोम! तुम हमें अतिशय विचित्र अन्न दो. हम द्वेषरहित द्यावा-पृथिवी को पुकारते हैं. हे देवो! हमें वीर संतान के साथ धन दो. (१०) सूक्त—६९ देवता—पवमान सोम इषुर्न धन्वन् प्रति धीयते मतिर्वत्सो न मातुरुप सर्ज्यूधनि. उरुधारेव दुहे अग्र आयत्यस्य व्रतेष्वपि सोम इष्यते.. (१) पवमान सोमरूपी इंद्र के प्रति हम अपनी स्तुति इस प्रकार अर्पित करते हैं, जिस प्रकार धनुष पर बाण रखा जाता है. जिस प्रकार बछड़ा गाय के थन का दूध पीने के लिए जन्म लेता है, उसी प्रकार इंद्र के नशे के लिए सोम की उत्पत्ति हुई है. जिस प्रकार दुधारू गाय बछड़े के सामने आकर दूध देती है, उसी प्रकार इंद्र स्तोताओं के सामने आकर विविध अभिलाषाएं पूरी करते हैं. इंद्र के यज्ञों में सोम की आवश्यकता पड़ती है. (१) उपो मतिः पृच्यते सिच्यते मधु मन्द्राजनी चोदते अन्तरासनि. पवमानः संतनिः प्रघ्नतामिव मधुमान्द्रप्सः परि वारमर्षति.. (२) स्तोताओं द्वारा सोमरूप इंद्र की स्तुति की जाती है एवं इंद्र के निमित्त सोमरस में जल मिलाया जाता है. नशीले सोमरस की धारा इंद्र के मुख में पहुंचती है. जिस तरह मारने में कुशल योद्धाओं का बाण शीघ्र ही निशाने पर पहुंच जाता है, उसी प्रकार विस्तृत, मादक रस वाले, छनने वाले एवं शीघ्र गतिशील सोम भेड़ के बालों से बने दशापवित्र पर आते हैं. (२) अव्ये वधूयुः पवते परि त्वचि श्रथ्नीते नप्तीरदितेर्ऋतं यते. हरिरक्रान्यजतः संयतो मदो नृम्णा शिशानो महिषो न शोभते.. (३) जलरूपी वधू से मिलने के लिए सोम भेड़ के चमड़े पर आते हैं. सोम यज्ञ में आकर धरती पर उत्पन्न ओषधियों को यजमानों के लिए फूल वाली बनाते हैं. हरे रंग वाले, सबके यज्ञ-योग्य एवं संगृहीत सोम शत्रुओं को पराजित करते हैं. महान् के समान सर्वत्र व्यापक सोम शत्रुओं के बलों को क्षीण करते हुए अपने तेज से चमकते हैं. (३) उक्षा मिमाति प्रति यन्ति धेनवो देवस्य देवीरुपयन्ति निष्कृतम्. अत्यक्रमीदर्जुनं वारमव्ययमतकं न निक्तं परि सोमो अव्यत.. (४) ebook converter DEMO Watermarks*