ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 1486, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंमघोनामायुः प्रतिरन्महि श्रव इन्द्राय सोम पवसे वृषा मदः.. (२) हे अन्नयुक्त सोम! किसी के द्वारा नष्ट न होने वाली स्तुतियां तुम्हारी प्रशंसा करती हैं. तुम दीप्तिशाली बनकर स्वर्णमय हाथों द्वारा संस्कृत स्थान की ओर बढ़ते हो. हे वर्षा करने वाले एवं नशीले सोम! तुम हव्य वाले यजमानों की आयु एवं महान् अन्न बढ़ाते हुए इंद्र के हेतु निचुड़ते हो. (२) इन्द्रस्य कुक्षा पवते मदिन्तम ऊर्जं वसानः श्रवसे सुमङ्गलः. प्रत्यङ् स विश्वा भुवनाभि पप्रथे क्रीळन्हरिरत्यः स्यन्दते वृषा.. (३) अत्यधिक नशीले, शक्तिदाता रस को ढकते हुए व शोभन कल्याण देने वाले सोम यजमान को अन्न देने के लिए इंद्र की कोख में निचुड़ते हैं. वे सभी प्राणियों को बढ़ाते हैं. वेदी पर क्रीड़ा करते हुए हरितवर्ण, गतिशील एवं बरसने वाले सोम टपकते हैं. (३) तं त्वा देवेभ्यो मधुमत्तमं नरः सहस्रधारं दुहते दश क्षिपः. नृभिः सोम प्रच्युतो ग्रावभिः सुतो विश्वान्देवाँ आ पवस्वा सहस्रजित्.. (४) हे सोम! मनुष्य एवं उनकी दस उंगलियां देवों के लिए अत्यंत मधुर एवं हजारों धाराओं वाले सोम को दुहती हैं. हे सोम! तुम मनुष्यों द्वारा पत्थरों की सहायता से निचुड़कर एवं हजारों धनों को जीतकर देवों को तृप्त करो. (४) तं त्वा हस्तिनो मधुमन्तमद्रिभिर्दुहन्त्यप्सु वृषभं दश क्षिपः. इन्द्रं सोम मादयन्दैव्यं जनं सिन्धोरिवोर्मिः पवमानो अर्षसि.. (५) सुंदर हाथों वाले लोगों की दस उंगलियां पत्थरों की सहायता से मधुर रस वाले एवं अभिलाषापूरक सोम को दुहती हैं. हे सोम! तुम निचुड़ते हुए तथा इंद्र एवं अन्य देवों को प्रसन्न करते हुए सागर की लहरों के समान जाते हो. (५) सूक्त—८१ देवता—पवमान सोम प्र सोमस्य पवमानस्योर्मय इन्द्रस्य यन्ति जठरं सुपेशसः. दध्ना यदिमुन्नीता यशसा गवां दानाय शूरमुदमन्दिषुः सुताः.. (१) जब निचोड़े हुए सोम गायों की शक्तिरूप दही के साथ मिलकर यजमान की अभिलाषा पूरी करने के लिए शूर इंद्र को उन्मत्त करते हैं, तब शुद्ध सोम की सुंदर लहरें इंद्र के पेट में जाती हैं. (१) अच्छा हि सोमः कलशाँ असिष्यददत्यो न वोळ्हा रघुवर्तनिर्वृषा. अथा देवानामुभयस्य जन्मनो विद्वाँ अश्रोत्यमृत इतश्च यत्.. (२)