भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 1516, कुल 1855 में से

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पृष्ठ 1516

हरिरानीतः पुरुवारो अप्स्वचिक्रदत्कलशे देवयूनाम्.. (२४) हे शुद्ध होते हुए सोम! पुत्र के निमित्त दूध पिलाने वाली स्त्रियों के समान यजमानों के लिए धन देने वाली एवं शोभन धाराओं वाली दीप्तियां पात्रों में जाती हैं. हरे रंग वाले, ऋत्विजों द्वारा लाए गए एवं अनेक जनों द्वारा वरण करने योग्य सोम जल में एवं देवाभिलाषी यजमानों के घर में बार-बार शब्द करते हैं. (२४) सूक्त—९७ देवता—पवमान सोम अस्य प्रैषा हेमना पूयमानो देवो देवेभिः समपृक्त रसम्. सुतः पवित्रं पर्येति रैभन्मितेव सद्म पशुमान्ति होता.. (१) प्रेरणा करने वाले, स्वर्ण द्वारा शुद्ध होते हुए एवं दीप्तिशाली सोम अपना रस देवों के साथ संयुक्त करते हैं. निचोड़ते हुए सोम शब्द करके उसी प्रकार दशापवित्र की ओर जाते हैं. जिस प्रकार ऋत्विज् यजमान के भली प्रकार बने हुए एवं पशुयुक्त यज्ञगृह में जाता है. (१) भद्रा वस्त्रा समन्या३ वसानो महान्कविर्निवचनानि शंसन्. आ वच्यस्व चम्वोः पूयमानो विचक्षणो जागृविर्देववीतौ.. (२) हे सोम! तुम कल्याणकारक, संग्राम में हितकारी एवं आच्छादक तेज को धारण करने वाले हो. तुम महान्, कवि, स्तोत्रों की प्रशंसा करने वाले, सबके विशेष द्रष्टा एवं जागरणशील हो. तुम यज्ञ में चमू नामक पात्रों में प्रवेश करो. (२) समु प्रियो मृज्यते सानो अव्ये यशस्तरो यशसां क्षैतो अस्मे. अभि स्वर धन्वा पूयमानो यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः.. (३) यश पाने वालों में परम यशस्वी, धरती पर उत्पन्न एवं प्रिय सोम ऊंचे तथा भेड़ के बालों से बने दशापवित्र पर शुद्ध किए जाते हैं. हे सोम! शुद्ध होते हुए अंतरिक्ष में भली प्रकार शब्द करो एवं कल्याणकारक साधनों से सदा हमारी रक्षा करो. (३) प्र गायताभ्यर्चाम देवान्त्सोमं हिनोत महते धनाय. स्वादुः पवाते अति वारमव्यमा सीदति कलशं देवयुर्नः.. (४) हे स्तोताओ! सोम की भली-भांति स्तुति करो, देवों की पूजा करो एवं महान् धन पाने के लिए सोम को प्रेरित करो. स्वादिष्ट सोम भेड़ के बालों से बने दशापवित्र पर छनते हैं एवं देवाभिलाषी बनकर द्रोणकलश में जाते हैं. (४) इन्दुर्दैवानामुप सख्यमायन्त्सहस्रधारः पवते मदाय. नृभिः स्तवानो अनु धाम पूर्वमगन्निन्द्रं महते सौभगाय.. (५) ebook converter DEMO Watermarks*