भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

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पृष्ठ 1519

धनों को सुख से प्राप्त कराते हुए विस्तृत द्रोणकलश में टपको. तुम लोहे के आयुधों से राक्षसों को मारते हुए ऊंचे एवं भेड़ के बालों से बने दशापवित्र पर धाराओं के साथ जाओ. (१६) वृष्टिं नो अर्ष दिव्यां जिगत्नुमिळावतीं शंगयीं जीरदानुम्. स्तुकेव वीता धन्वा विचन्वन् बन्धूँरिमाँ अवराँ इन्दो वायून्.. (१७) हे सोम! हमारे लिए द्युलोक में उत्पन्न, गमनशील, अन्नयुक्त, सुख देने वाली एवं शीघ्र दान करने वाली वर्षा करो. संतान के समान सुंदर, मित्रतुल्य एवं धरती से संबंधित वायुओं को खोजते हुए तुम यहां आओ. (१७) ग्रन्थिं न वि ष्य ग्रथितं पुनान ऋजुं च गातुं वृजिनं च सोम. अत्यो न क्रदो हरिरा सृजानो मर्यो देव धन्व पस्त्यावान्.. (१८) हे सोम! गांठ के समान पापों से बंधे हुए मुझे तुम पवित्र बनाओ तथा मुझे मार्ग एवं शक्ति दो. हे हरे रंग वाले व दशापवित्र पर रखे जाते हुए सोम! तुम घोड़े के समान शब्द करते हो. शत्रुनाशक एवं घर देने वाले दीप्त सोम! तुम मेरे पास आओ. (१८) जुष्टो मदाय देवतात इन्दो परि ष्णुना धन्व सानो अव्ये. सहस्रधारः सुरभिर्दबधः परि स्रव वाजसातौ नृषह्ये.. (१९) हे पर्याप्त मद से युक्त सोम! तुम देवयज्ञ में ऊंचे एवं भेड़ के बालों से बने दशापवित्र पर बहने वाली धाराओं के साथ जाओ. हे अनेक धाराओं से युक्त एवं शोभनगंध वाले सोम! तुम अपराजित होकर मनुष्यों द्वारा सहन करने योग्य युद्ध में अन्नलाभ के लिए जाओ. (१९) अरश्मानो येऽरथा अयुक्ता अत्यासो न ससृजानास आजौ. एते शुक्रासो धन्वन्ति सोमा देवासस्ताँ उप याता पिबध्यै.. (२०) जिस प्रकार बिना रस्सी का, रथरहित व बिना बंधन का घोड़ा सजकर युद्ध में अपने लक्ष्य को प्राप्त करता है, उसी प्रकार यज्ञ में बनाए गए एवं दीप्त सोम जल्दी से द्रोणकलश की ओर जाते हैं. हे देवो! द्रोणकलश में आने वाले सोम को पीने के लिए हमारे पास आओ. (२०) एवा न इन्दो अभि देववीतिं परि स्रव नभो अर्णश्वमूषु. सोमो अस्मभ्यं काम्यं बृहन्तं रयिं ददातु वीरवन्तमुग्रम्.. (२१) हे सोम! हमारे यज्ञ को लक्ष्य करके अपना रस द्युलोक से चमू नामक पात्र में गिराओ. सोम हमें मनचाहा, महान्, वीर संतान से युक्त एवं बलपूर्ण अन्न दें. (२१) तक्षद्यदी मनसो वेनतो वाग्ज्येष्ठस्य वा धर्मणि क्षोरनीके. ebook converter DEMO Watermarks*