ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 1551, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंनानाधियो वसूयवोऽनु गा इव तस्थिमेन्द्रायेन्दो परि स्रव.. (३) मैं स्तोता हूं, मेरा पुत्र वैद्य है और मेरी पुत्री कंडों पर जौ भूनने वाली है. जिस प्रकार गाएं गोशाला में अलग-अलग घूमती हैं, उसी प्रकार हम सब धन की इच्छा से अलग-अलग काम करते हैं. हे सोम! तुम इंद्र के लिए रस गिराओ. (३) अश्वो वोळहा सुखं रथं हसनामुपमन्त्रिणः. शेपो रोमण्वन्तौ भेदौ वारिन्मण्डूक इच्छतीन्द्रायेन्दो परि स्रव.. (४) मंजिल पर पहुंचने वाला कल्याणकारी घोड़ा एवं दरबारी लोग हंसी-मजाक की इच्छा करते हैं. पुरुष जननेंद्रिय जिस प्रकार रोम वाला छेद चाहती है एवं मेंढक जल चाहता है, उसी प्रकार मैं सोम की इच्छा करता हूं. हे सोम! तुम इंद्र के लिए अपना रस बरसाओ. (४) सूक्त—११३ देवता—पवमान सोम शर्यणावति सोममिन्द्रः पिबतु वृत्रहा. बलं दधान आत्मनि करिष्यन्वीर्यं महदिन्द्रायेन्दो परि स्रव.. (१) शत्रुनाशक इंद्र शर्यणावत नामक तालाब में सोम को पिएं एवं आत्मविश्वासी व महान् शक्तिशाली बनें. हे सोम! तुम इंद्र के लिए रस टपकाओ. (१) आ पवस्व दिशां पत आर्जीकात्सोम मीढ्वः. ऋतवाकेन सत्येन श्रद्धया तपसा सुत इन्द्रायेन्दो परि स्रव.. (२) हे दिशाओं के स्वामी एवं अभिलाषापूरक सोम! तुम ऋजीक देश से आकर रस बरसाओ. तुम्हें शुद्ध एवं सच्चे स्तुतिवचनों व श्रद्धा तथा तप के द्वारा निचोड़ा जाता है. हे सोम! तुम इंद्र के लिए रस बरसाओ. (२) पर्जन्यवृद्धं महिषं तं सूर्यस्य दुहिताभरत्. तं गन्धर्वाः प्रत्यगृह्णन्तं सोमे रसमादधुरिन्द्रायेन्दो परि स्रव.. (३) श्रद्धा नामक सूर्यपुत्री मेघ के समान समृद्ध और महान् सोम को स्वर्ग से लाई थी. गंधर्वों ने उस सोम को पकड़कर उस में रस डाला. हे सोम! तुम इंद्र के लिए रस टपकाओ. (३) ऋतं वदन्नृतद्युम्न सत्यं वदन्सत्यकर्मन्. श्रद्धां वदन्त्सोम राजन्धात्रा सोम परिष्कृत इन्द्रायेन्दो परि स्रव.. (४) हे सच्चे यश वाले, यथार्थ कर्म करने वाले, निचुड़ते हुए व सबके स्वामी सोम! तुम यज्ञ, सत्य और श्रद्धा का उच्चारण करते हुए देवपोषक यजमान के द्वारा अलंकृत होकर इंद्र के लिए रस नीचे गिराते हो. (४) ebook converter DEMO Watermarks*