ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 1569, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंरपदगन्धर्वीरप्या च योषणा नदस्य नादे परि पातु मे मनः. इष्टस्य मध्ये अदितिर्नि धातु नो भ्राता नो ज्येष्ठः प्रथमो वि वोचति.. (२) अग्नि के गुणों का वर्णन करने वाली गंधर्वपत्नी एवं जलों से संस्कृत आहुति ने अग्नि को विशेष तृप्त किया है. मेरा मन स्तुतियों के उच्चारण में भली-भांति लगा रहे. खंडनरहित अग्नि हमें यज्ञ के बीच में स्थित करें. यजमानों में मुख्य अर्थात् मेरे बड़े भाई अग्नि की विशेषरूप से स्तुति करें. (२) सो चिन्नु भद्रा क्षुमती यशस्वत्युषा उवास मनवे स्वर्वती. यदीमुशन्तमुशतामनु क्रतुमग्निं होतारं विदथाय जीजनन्.. (३) भद्रा, शब्दयुक्त एवं अन्न वाली उषा यजमान के लिए आदित्य के साथ शीघ्र उदित हुई. उस समय यज्ञाभिलाषियों के ऊपर प्रसन्न होने वाले एवं देवों को बुलाने वाले अग्नि को उत्पन्न किया गया. (३) अध त्यं द्रप्सं विभ्वं विचक्षणं विराभरदिषितः श्येनो अध्वरे. यदी विशो वृणते दस्ममार्या अग्निं होतारमध धीरजायत.. (४) बाज पक्षी अग्नि द्वारा प्रेरित होकर यज्ञ में महान्, सूक्ष्मदर्शी तथा न कम न अधिक सोम को ले आया. जब आर्य यजमान उस दर्शनीय व देवों के आह्वान करने योग्य अग्नि की प्रार्थना करते हैं, तब होता यज्ञक्रिया आरंभ करते हैं. (४) सदासि रण्वो यवसेव पुष्यते होत्राभिरग्ने मनुषः स्वध्वरः. विप्रस्य वा यच्छशमान उक्थ्यं१ वाजं ससवाँ उपयासि भूरिभिः.. (५) हे अग्नि! तुम पशुओं को पुष्ट करने वाली घास के समान सदा रमणीय हो. तुम मनुष्यों के हव्य से शोभन यज्ञ वाले बनो. तुम स्तोता की स्तुतियों की प्रशंसा करते हुए एवं हव्य का उपभोग करते हुए बहुत से देवों के साथ जाते हो. (५) उदीरय पितरा जार आ भगमियक्षति हर्यतो हृत्त इष्यति. विवक्ति वह्निः स्वपस्यते मखस्तविष्यते असुरो वेपते मती.. (६) हे अग्नि! तुम अपना प्रकाश अपने माता-पिता द्यावा-पृथिवी की ओर इस प्रकार भेजो, जिस प्रकार सूर्य अपनी ज्योति इनकी ओर भेजते हैं. यज्ञ की कामना करने वाला यजमान सच्चे मन से यज्ञ करना चाहता है एवं स्तुति वचन बोलने का इच्छुक है. अध्वर्यु यज्ञकर्म को पूरा करने को उत्सुक है. ब्रह्मा स्तोत्र को बढ़ाते हैं एवं उनकी बुद्धि यज्ञ के विषय में कभी- कभी शंका करने लगती है. (६) यस्ते अग्ने सुमतिं मर्तो अक्षत्सहसः सूनो अति स प्र शृण्वे. इषं दधानो वहमानो अश्वैरा स द्युमाँ अमवान्भूषति द्यून्.. (७) ebook converter DEMO Watermarks*