ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 1578, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंतेभिः स्वराळसुनीतिमेतां यथावशं तन्वं कल्पयस्व.. (१४) हे स्वयं प्रकाश अग्नि! जो पितर अग्नि द्वारा जलाए गए हैं एवं जो नहीं जलाए गए हैं, वे सब स्वर्ग के बीच में स्वधा शब्द के साथ दिए गए हव्यों से प्रसन्न होते हैं. तुम उन पितरों के साथ मिलकर उनके देव शरीर को उनकी इच्छा के अनुसार बनाओ. (१४) सूक्त—१६ देवता—अग्नि मैनमग्ने वि दहो माभि शोचो मास्य त्वचं चिक्षिपो मा शरीरम्. यदा शृतं कृणवो जातवेदोऽथेमेनं प्र हिणुतात्पितृभ्यः.. (१) हे अग्नि! इस मरे हुए व्यक्ति को पूरी तरह मत जलाओ. इसे कष्ट मत पहुंचाओ. इसके चमड़े और शरीर को इधर-उधर मत बिखेरो. हे जातवेद अग्नि! जब तुम इसे पका चुको, तभी इसे पितरों के पास भेज देना. (१) शृतं यदा करसि जातवेदोऽथेमेनं परि दत्तात्पितृभ्यः. यदा गच्छात्यसुनीतिमेतामथा देवानां वशनीर्भवति.. (२) हे अग्नि! तुम इस मरे हुए शरीर को जब पका लो, तभी इसे पितरों के पास पहुंचा देना. जब यह दोबारा प्राण प्राप्त करेगा, तब देवों के वश में रहेगा. (२) सूर्यं चक्षुर्गच्छतु वातमात्मा द्यां च गच्छ पृथिवीं च धर्मणा. अपो वा गच्छ यदि तत्र ते हितमोषधीषु प्रति तिष्ठा शरीरैः.. (३) हे मरे हुए व्यक्ति! तुम्हारी आंखें सूर्य को और तुम्हारा प्राण वायु को प्राप्त हो. तुम अपने धार्मिक कार्यों के कारण स्वर्ग या धरती पर जाओ. यदि जल में तुम्हारा सुख है तो वहां जाओ. तुम अपने शरीर के द्वारा ओषधियों में स्थित रहो. (३) अजो भागस्तपसा तं तपस्व तं ते शोचिस्तपतु तं ते अर्चिः. यास्ते शिवास्तन्वो जातवेदस्ताभिर्वहैनं सुकृतामु लोकम्.. (४) हे अग्नि! इस मरे हुए व्यक्ति का जो भाग जन्मरहित है, उसीको तुम अपने ताप से तपाओ. तुम्हारी ज्वाला एवं प्रकाश उसे तपावे. हे जातवेद अग्नि! तुम अपने कल्याणकारी रूपों के द्वारा इसे उत्तम कर्म करने वालों के लोकों में ले जाओ. (४) अव सृज पुनरग्ने पितृभ्यो यस्त आहुतश्चरति स्वधाभिः. आयुर्वसान उप वेतु शेषः सं गच्छतां तन्वा जातवेदः.. (५) हे अग्नि! जो मरा हुआ व्यक्ति तुम्हारी आहुति बनकर स्वधा शब्द के साथ ऊपर जाता है, उसे पितरों के समीप जाने की प्रेरणा दो. इसके शरीर का शेष भाग जीवन प्राप्त करे. हे ebook converter DEMO Watermarks*