भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 1599, कुल 1855 में से

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पृष्ठ 1599

इंद्र ने कहा— “इस स्तोत्र में मैंने जो कहा है, वह सत्य है. इसे तुम जान लो. मैं दो पैरों वाले मनुष्यों और चार पैरों वाले पशुओं को बनाता हूं. जो व्यक्ति अपने पुरुषों को स्त्रियों के विरुद्ध लड़ने भेजता है, उसका धन मैं युद्ध के बिना ही छीनकर अपने भक्तों को देता हूं.” (१०) यस्यानक्षा दुहिता जात्वास कस्तां विद्वाँ अभि मन्याते अन्धाम्. कतरो मेनिं प्रति तं मुचाते य ईं वहाते य ईं वा वरेयात्.. (११) “मुझ इंद्र से उत्पन्न दर्शनहीना कन्या प्रकृति को मुझ में लीन जानते हुए कौन आश्रय देगा? वृत्र आदि शत्रुओं पर वज्र कौन सा देव फेंकता है? इस शत्रु को मेरे अतिरिक्त न कोई वहन कर सकता है और न वरण कर सकता है.” (११) कियती योषा मर्यतो वधूयोः परिप्रीता पन्यसा वार्येण. भद्रा वधूर्भवति यत्सुपेशाः स्वयं सा मित्रं वनुते जने चित्.. (१२) “ऐसी कितनी स्त्रियां हैं जो मानव जीवन के भोग प्रदान करने वाले एवं स्त्री के अभिलाषी पुरुष के प्रति धन अथवा प्रशंसा के कारण आसक्त हो जाती हैं. जो सुगठित शरीर वाली भली नारी होती है, वह बहुत से पुरुषों में से अपने मन के अनुकूल पति चुन लेती है.” (१२) पत्तो जगार प्रत्यञ्चमत्ति शीर्ष्णा शिरः प्रति दधौ वरूथम्. आसीन ऊर्ध्वमुपसि क्षिणाति न्युङ्ङुत्तानामन्वेति भूमिम्.. (१३) सूर्य अपनी किरणों द्वारा जल सोख लेते हैं, अपने समीप गए हुए जल का उपभोग करते हैं तथा वर्षा का जल अपनी किरणों द्वारा सबके सिरों पर बरसाते हैं. सूर्य अपने मंडल में स्थित होकर अपनी ऊर्ध्वगामिनी किरणों को फेंकते हैं एवं किरणसमूह के साथ धरती पर विस्तृत प्रकाश का अनुगमन करते हैं. (१३) बृहन्नच्छायो अपलाशो अर्वा तस्थौ माता विषितो अत्ति गर्भः. अन्यस्या वत्सं रिहती मिमाय कया भुवा नि दधे धेनूरूधः.. (१४) नित्य गतिशील व महान् आदित्य बिना पत्तों के पेड़ के समान छायारहित हैं. वर्षा द्वारा लोक निर्माण करने वाले, आलंबनरहित एवं तीनों लोकों के गर्भ के समान आदित्य हव्य भक्षण करते हैं. द्युलोक रूपधारी गाय अदिति के पुत्र को प्रेम के साथ चाटती हुई पोषित करती है. द्यौरूपिणी गाय आदित्य को अपने थनों के समान धारण करती है. (१४) सप्त वीरासो अधरादुदायन्नष्टोत्तरात्तात् समजग्मिरन्ते. नव पश्चातात्स्थिविमन्त आयन्दश प्राक्सानु वि तिरन्त्यश्वः.. (१५) इंद्ररूपी प्रजापति के शरीर से विश्वामित्र आदि सात ऋषियों ने जन्म लिया. प्रजापति के ebook converter DEMO Watermarks*