ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 1608, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ें(१५) सूक्त—३१ देवता—विश्वेदेव आ नो देवानामुप वेतु शंसो विश्वेभिस्तुरैरवसे यजत्रः. तेभिर्वयं सुसखायो भवेम तरन्तो विश्वा दुरिता स्याम.. (१) हम स्तोताओं के स्तुतियोग्य एवं यज्ञपात्र इंद्र शीघ्रगामी मरुतों के साथ हमारी रक्षा के लिए आवें. हम उन देवों के शोभन सखा बनें एवं सभी पापों से पार हो जावें. (१) परि चिन्मर्तो द्रविणं ममन्यादृतस्य पथा नमसा विवासेत्. उत स्वेन क्रतुना सं वदेत श्रेयांसं दक्षं मनसा जगृभ्यात्.. (२) मनुष्य सभी प्रकार से देवयज्ञ के लिए धन की अभिलाषा करें एवं धन पाकर हव्य द्वारा यज्ञ के मार्ग से देवों की सेवा करें. वे अपने ज्ञान से देवों का ध्यान करें एवं अति प्रशंसनीय तथा सर्वव्यापक अंतरात्मा को मन से ग्रहण करें. (२) अधायि धीतिरसमृग्रमंशास्तीर्थे न दस्ममुप यन्त्यूमाः. अभ्यानशम सुवितस्य शूंषं नवेदसो अमृतानामभूम.. (३) देवयज्ञ की क्रिया आरंभ हो गई है. जिस प्रकार तीर्थ में तर्पण वाले जल के अंश देवों के पास जाते हैं, उसी प्रकार हमारे दिए हुए तृप्तिकारक हव्य दर्शनीय एवं छोटे-बड़े देवों के पास जाते हैं. हमने विस्तृत स्वर्ग का सुख पाया है और हम देवों का स्वरूप जानने वाले बनें. (३) नित्यश्चाकन्यात् स्वपतिर्दमूना यस्मा उ देवः सविता जजान. भगो वा गोभिर्यमेमनज्यात्सो अस्मै चारुश्छदयदुत स्यात्.. (४) अपनी प्रजाओं के स्वामी प्रजापति दानोत्सुक होकर फल देने की अभिलाषा करें. यज्ञकर्त्ता को सविता देव ने फल दिया है. स्तुति द्वारा प्रसन्न इंद्र एवं अर्यमा मुझे फल दें. सुंदर रूप वाले सभी देव मुझे फल दें. (४) इयं सा भूया उषासामिव क्षा यद्ध क्षुमन्तः शवसा समायन्. अस्य स्तुतिं जरितुर्भिक्षमाणा आ नः शग्मास उपयन्तु वाजाः.. (५) जिस समय स्तुति अभिलाषी देवगण शब्द करते हुए तेज चाल से मेरे पास आए, उस समय यह धरती प्रातःकाल के प्रकाश से भर गई. सुखकारक अन्न हमारे पास आवे. (५) अस्येदेषा सुमतिः पप्रथानाभवत्पूर्व्या भूमना गौः. अस्य सनीळा असुरस्य योनौ समान आ भरणे बिभ्रमाणाः.. (६) ebook converter DEMO Watermarks*