भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 1627, कुल 1855 में से

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पृष्ठ 1627

युवां कवी षः पर्यश्विना रथं विशो न कुत्सो जरितुर्नशायथः. युवोर्ह मक्षा पर्यश्विना मध्वासा भरत निष्कृतं न योषणा.. (६) हे मेधावी अश्विनीकुमारो! तुम लोग रथ पर बैठकर कुत्स के समान स्तोता के घर जाते हो. तुम्हारे मधु को मधुमक्खियां इस प्रकार अपने मुंह में भर लेती हैं, जिस प्रकार युवती संभोग में रत रहती है. (६) युवं ह भुज्युं युवमश्विना वशं युवं शिज्जारमुशनामुपारथुः. युवो ररावा परि सख्यमासते युवोरहमवसा सुन्मना चके.. (७) हे अश्विनीकुमारो! तुमने भुज्यु, वश, अत्रि और उशना का उद्धार किया. हव्य देने वाला यजमान तुम्हारी मित्रता प्राप्त करता है. मैं तुम्हारी रक्षा के द्वारा मिलने वाले सुख की कामना करता हूं. (७) युवं ह कृशं युवमश्विना शयुं युवं विधन्तं विधवामुरुष्यथः. युवं सनिभ्यः स्तनयन्तमश्विनाप व्रजमूर्णूथः सप्तास्यम्.. (८) हे अश्विनीकुमारो! तुमने कृश, शंयु, अपने सेवकों ओर विधवा वध्रिमती का उद्धार किया था. तुम ही अपने यजमानों के लिए गरजते हुए तथा गतिशील द्वार वाले मेघ को भेदकर जल बरसाते हो. (८) जनिष्ट योषा पतयत्कनीनको वि चारुहन्वीरुधो दंसना अनु. आस्मै रीयन्ते निवनेव सिन्धवोऽस्मा अह्ने भवति तत्पतित्वनम्.. (९) हे अश्विनीकुमारो! तुम्हारी कृपा से मैं युवती बन गई हूं और मेरी कामना करने वाला पति आ गया है. तुम्हारे द्वारा की गई वर्षा के बाद पेड़पौधे उग आए हैं. जिस प्रकार नीचे बहने वाली नदियां सागर की ओर जाती हैं, उसी प्रकार पौधे इन की ओर बढ़ रहे हैं. इस पति को ऐसा यौवन प्राप्त हो, जिसे कोई नष्ट न कर सके. (९) जीवं रुदन्ति वि मयन्ते अध्वरे दीर्घामनु प्रसितिं दीधियुर्नरः. वामं पितृभ्यो य इदं समेरिरे मयः पतिभ्यो जनयः परिष्वजे.. (१०) जो लोग अपनी पत्नियों के वियोग में रोते हैं, पत्नियों को यज्ञ में अपने समीप बैठाते हैं, उन्हें अपनी विस्तृत बांहों में समेटते हैं और उनसे संतान उत्पन्न करके उन्हें पितृयज्ञ में प्रेरित करते हैं, उनकी स्त्रियां सुख के साथ उनका आलिंगन करती हैं. (१०) न तस्य विद्म तदु षु प्र वोचत युवा ह यद्युवत्याः क्षेति योनिषु. प्रियोस्रियस्य वृषभस्य रेतिनो गृहं गमेमाश्विना तदुश्मसि.. (११) हे अश्विनीकुमारो! मैं पतिपत्नी के संसर्ग वाले सुख को नहीं जानती. मुझे उस विषय में ebook converter DEMO Watermarks*