भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 1641, कुल 1855 में से

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पृष्ठ 1641

अह दस्युभ्यः परि नृम्णमा ददे गोत्रा शिक्षन् दधीचे मातरिश्वने.. (२) मैंने अथर्वा के पुत्र दध्यङ् का शिर काट डाला था. कुएं में गिरे हुए त्रित की रक्षा के लिए मैंने मेघ में जल धारण किया था एवं शत्रुओं से धन छीना था. मैंने मातरिश्वा के पुत्र दधीचि के कल्याण के लिए जलरक्षक मेघों को नम्र बनाया था. (२) मह्यं त्वष्टा वज्रमतक्षदायसं मयि देवासोऽवृजन्नपि क्रतुम्. ममानीकं सूर्यस्येव दुष्तरं मामार्यन्ति कृतेन कर्त्वेन च.. (३) त्वष्टा ने मेरे लिए लोहे का वज्र बनाया था. देवगण मेरे लिए यज्ञ पूरा करते हैं. मेरी सेवा सूर्य के समान दुस्तर है. लोग मेरे द्वारा भूतकाल में किए गए एवं भविष्य में किए जाने वाले कार्यों के कारण मेरे पास आते हैं. (३) अहमेतं गव्यमश्व्यं पशुं पुरीषिणं सायकेना हिरण्ययम्. पुरू सहस्रा नि शिशामि दाशुषे यन्मा सोमास उक्थिनो अमन्दिषुः.. (४) जब यजमान मुझे सोमरस एवं स्तुतियों से प्रसन्न करते हैं, तब मैं आयुधों के द्वारा शत्रु की गायों, घोड़ों, धनों एवं दुधारू पशुओं को जीतता हूं तथा हव्यदाता यजमान के कल्याण के लिए अनेक शस्त्रों को तेज करता हूं. (४) अहमिन्द्रो न परा जिग्य इद्धनं न मृत्यवेऽव तस्थे कदा चन. सोममिन्मा सुन्वन्तो याचता वसु न मे पूरवः सख्ये रिषाथन.. (५) मैं धनों का स्वामी हूं. मेरे धनों को कोई जीत नहीं पाता. मैं कभी भी मृत्यु का लक्ष्य नहीं बनता. हे सोमरस निचोड़ने वाले यजमानो! तुम मनचाहा धन मुझसे ही मांगो. हे मनुष्यो! मेरी मित्रता का विनाश कभी मत करो. (५) अहमेताञ्छाश्वसतो द्वाद्वेन्द्रं ये वज्रं युधयेऽकृण्वत. आह्वयमानाँ अव हन्मनाहनं दृळ्हा वदन्ननमस्युर्नमस्विनः.. (६) मैंने अधिक शक्तिशाली व दो-दो के रूप में मुझ वज्रधारी इंद्र के साथ लड़ने के लिए तैयार व युद्ध के लिए ललकारने वाले शत्रुओं को कठोर वचन कहकर मार डाला. मैं स्वयं नहीं झुका. मैंने उन्हें झुका दिया. (६) अभी३दमेकमेको अस्मि निष्षाळभी द्वा किमु त्रयः करन्ति. खले न पर्षान् प्रति हान्म भूरि किं मा निन्दन्ति शत्रवोऽनिन्द्राः.. (७) मैं अकेला ही एक शत्रु को हराता हूं. शत्रुओं को सहन न करने वाला मैं दो को भी पराजित करता हूं. तीन शत्रु मेरा क्या कर लेंगे? किसान जिस प्रकार खलियान में अनाज को कुचलता है, उसी प्रकार मैं बहुत से शत्रुओं को नष्ट कर देता हूं. मुझ इंद्र के विरोधी शत्रु मेरी ebook converter DEMO Watermarks*