ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 1654, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंदेवत्व को प्राप्त हमारे पितरों ने देवों की महिमा प्राप्त की एवं देवों के साथ यज्ञकार्य पूर्ण किए. जो तेजस्वी वस्तुएं हैं, वे सब उनके साथ मिल गईं. पितर देवों के शरीर में प्रवेश कर गए हैं. (४) सहोभिर्विश्वं परि चक्रमू रजः पूर्वा धामान्यमिता मिमानाः. तनूषु विश्वा भुवना नि येमिरे प्रासारयन्त पुरुध प्रजा अनु.. (५) हमारे पितरों ने अपनी शक्तियों से सारे लोकों की परिक्रमा की है तथा उन स्थानों पर गए हैं, जहां दूसरे नहीं जा पाते. उन्होंने अपने शरीर में सभी लोकों को नियमित किया है एवं प्रजाओं पर अपना प्रभुत्व अनेक प्रकार से स्थापित किया है. (५) द्विधा सूनवोऽसुरं स्वर्विदमास्थापयन्त तृतीयेन कर्मणा. स्वां प्रजां पितरः पित्र्यं सह आवरेष्वदधुस्तन्तुमाततम्.. (६) आदित्य के पुत्र देवों ने प्रजा उत्पत्तिरूप तीसरे कर्म द्वारा शक्तिशाली एवं स्वर्गज्ञाता आदित्य को दो प्रकार से स्थापित किया था. हमारे पितरों ने अपनी संतान को उत्पन्न करके उनके शरीर में पैतृक बल स्थापित किया. उन्होंने चिरस्थायी वंश स्थापित किया. (६) नावा न क्षोदः प्रदिशः पृथिव्याः स्वस्तिभिरति दुर्गाणि विश्वा. स्वां प्रजां बृहदुक्थो महित्वावरेष्वदधादा परेषु.. (७) मनुष्य नाव से नदी पार करने के समान धरती की विभिन्न दिशाओं का अतिक्रमण करते हैं. लोग कल्याण द्वारा जिस प्रकार सभी विपत्तियों के पार जाते हैं, उसी प्रकार बृहदुक्थ ऋषि ने अपनी शक्ति से अपने पुत्र को समीपवर्ती एवं दूरवर्ती पदार्थों में स्थापित किया. (७) सूक्त—५७ देवता—मन मा प्र गाम पथो वयं मा यज्ञादिन्द्र सोमिनः. मान्तः स्थुर्नों अरातयः.. (१) हे इंद्र! हम सुपथ से विचलित न हों तथा सोमरस वाले यजमान के यज्ञ से दूर न रहें. शत्रु हमारे बीच में न आवें. (१) यो यज्ञस्य प्रसाधनस्तन्तुर्देवेष्वाततः. तमाहुतं नशीमहि.. (२) जो अग्नि यज्ञ का विशेष साधन है एवं आहवनीय आदि रूप से देवों के समीप तक विस्तृत है, उस सब ओर से बुलाए गए अग्नि को हम प्राप्त करें. (२) मनो न्वा हुवामहे नाराशंसेन सोमेन. पितॄणां च मन्मभिः... (३)