ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 1657, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंआदि प्र तार्यायुः प्रतरं नवीयः स्थातारेव क्रतुमता रथस्य. अध च्यवान उत्तवीत्यर्थं परातरं सु निर्ऋतिर्जिहीताम्.. (१) जिस प्रकार सारथि वाले रथ पर चढ़ा हुआ व्यक्ति सुख प्राप्त करता है, उसी प्रकार सुबंधु की यौवनयुक्त आयु बढ़े. ह्रासवाली आयु का आदमी अपनी मनपसंद आयु प्राप्त करता है. तुम्हारा पाप नष्ट हो. (१) सामन्नु राये निधिमन्वन्वं करामहे सु पुरुध श्रवांसि. ता नो विश्वानि जरिता ममत्तु परातरं सु निर्ऋतिर्जिहीताम्.. (२) हम परम आयुरूप धन पाने के लिए सामगान के साथ-साथ भक्षण योग्य अन्न एकत्र करते हैं. निर्ऋति हमारे सभी अन्नों का भक्षण करें एवं दूर देश को चले जावें. (२) अभी ष्वार्यः पौंस्यैर्भवेम द्यौर्न भूमिं गिरयो नाज्रान्, ता नो विश्वानि जरिता चिकेत परातरं सु निर्ऋतिर्जिहीताम्.. (३) हम बलों द्वारा अपने शत्रुओं को उसी प्रकार ठीक से हटावें, जिस प्रकार आकाश धरती को पराजित करता है. पर्वत जिस प्रकार बादलों की गति रोक लेते हैं, उसी प्रकार हम शत्रुओं की गति रोकें. निर्ऋति हमारी स्तुति सुनें और दूर चली जावें. (३) मो षु णः सोम मृत्यवे परा दाः पश्येम नु सूर्यमुच्चरन्तम्. द्युभिर्हितो जरिमा सू नो अस्तु परातरं सु निर्ऋतिर्जिहीताम्.. (४) हे सोम! हमें मृत्यु के हाथों में मत दो. हम उदित होते हुए सूर्य को बहुत समय तक देखें. दिवसों से प्रेरित हमारी वृद्धावस्था सुखकर हो. निर्ऋति हमारी स्तुति सुनकर दूर चली जावें. (४) असुनीते मनो अस्मासु धारय जीवातवे सु प्र तिरा न आयुः. रारन्धि नः सूर्यस्य सन्दृशि घृतेन त्वं तन्वं वर्धयस्व.. (५) हे असुनीतिदेवी! हम पर कृपा करो और जीवित रहने के लिए हमारी आयु भली प्रकार बढ़ाओ. हमें सूर्य के चिरदर्शन के लिए स्थापित करो. तुम हमारे दिए हुए घी से अपना शरीर बढ़ाओ. (५) असुनीते पुनरस्मासु चक्षुः पुनः प्राणमिह नो धेहि भोगम्. ज्योक् पश्येम सूर्यमुच्चरन्तमनुमते मृळया नः स्वस्ति.. (६) हे असुनीतिदेवी! हमें पुनः चक्षु प्रदान करो. भोग करने के लिए हम में प्राण स्थापित ebook converter DEMO Watermarks*