भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 1672, कुल 1855 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1672

मरुद्गण अन्न वाले घर के समान देखने में सुंदर हैं. रुद्रपुत्र मरुतों की स्तुति कल्याणकारिणी है. हम गायों रूपी धन से युक्त होकर मानवों में यशस्वी बनें. हे देवो! हम सदा अन्न से युक्त हों. (११) यां मे धियं मरुत इन्द्र देवा अददात वरुण मित्र यूयम्. तां पीपयत पयसेव धेनुं कुविद्गिरो अधि रथे वहाथ.. (१२) हे मरुतो, इंद्र, देवगण, वरुण एवं मित्र! जिस प्रकार गाय दूध से भरी रहती है, उसी प्रकार तुम मेरे कर्म को फलयुक्त करो. तुम हमारी स्तुतियां सुनकर रथ के द्वारा यज्ञ में आए हो. (१२) कुविदङ्ग प्रति यथा चिदस्य नः सजात्यस्य मरुतो बुबोधथ. नाभा यत्र प्रथमं संनसामहे तत्र जामित्वमदितिर्दधातु नः.. (१३) हे मरुतो! तुमने पहले अनेक बार जैसा हमारी मैत्री को जाना है, उसी प्रकार इस बार भी जानो. धरती की नाभितुल्य जिस वेदी पर हम हव्य से मिलते हैं, वहां देवमाता अदिति हमारे साथ मित्रता करें. (१३) ते हि द्यावापृथिवी मातरा मही देवी देवाञ्जन्मना यज्ञिये इतः. उभे बिभृत उभयं भरीमभिः पुरू रेतांसि पितृभिश्च सिञ्चतः.. (१४) सबका निर्माण करने वाले, महान्, दिव्य एवं यज्ञ के योग्य द्यावा-पृथिवी जन्म के साथ ही देवों को प्राप्त करते हैं. ये द्यावा-पृथिवी नानाविध उपायों से देवों और मानवों की रक्षा करते हैं तथा पितृतुल्य देवों के साथ जल बरसाते हैं. (१४) वि षा होत्रा विश्वमश्नोति वार्यं बृहस्पतिररमतिः पनीयसी. ग्रावा यत्र मधुषुदुच्यते बृहदवीवश्नन्त मतिभिर्मनीषिणः.. (१५) बड़ों का पालन करने वाली, पर्याप्त स्तुति वाली, देवों की अधिक स्तुति करने वाली एवं सोमरस निचोड़ने के कारण महती वाणी सभी उत्तम धनों को व्याप्त करती हैं. विद्वान् स्तोता अपनी स्तुतियों से देवों को यज्ञ का अभिलाषी बनाते हैं. (१५) एवा कविस्तुवीरवाँ ऋतज्ञा द्रविणस्युर्द्रविणसश्चकानः. उक्थेभिरत्र मतिभिश्च विप्रोऽपीपयदगयो दिव्यानि जन्म.. (१६) कवि अनेक प्रकार की स्तुतियों वाले, यज्ञ के ज्ञाता, धन के इच्छुक, पशु आदि के अभिलाषी एवं मेधावी गय ऋषि ने धन की कामना करते हुए उक्थों और स्तोत्रों द्वारा देवों की स्तुति की थी. (१६) एवा प्लतेः सूनुरवीवृधद्वो विश्व आदित्या अदिते मनीषी. ebook converter DEMO Watermarks*

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित) · पृष्ठ 1672, कुल 1855 में से · BharatKosha