ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 1678, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंक्षेत्रस्य पतिं प्रतिवेशमीमहे विश्वान्देवाँ अमृताँ अप्रयुच्छतः.. (१३) पुरोहितों में प्रमुख व देवों को बुलाने वाले अग्नि एवं आदित्य की सेवा मैं हव्य द्वारा करता हूं एवं विघ्नरहित होकर यज्ञमार्ग का अनुगमन करता हूं. मैं अपने समीपवर्ती, क्षेत्रपति, मरणरहित एवं प्रमादरहित सभी देवों से याचना करता हूं. (१३) वसिष्ठासः पितृवद्वाचमक्रत देवाँ ईळाना ऋषिवत् स्वस्तये. प्रीता इव ज्ञातयः काममेत्यास्मे देवासोऽव धूनुता वसु.. (१४) वसिष्ठ के पुत्रों ने अपने पिता के समान स्तुति की. उन्होंने अपने पिता के समान ही कल्याण पाने के लिए देवों की प्रशंसा की. प्रसन्न बांधव जिस प्रकार धन देते हैं, उसी प्रकार तुम हमारे सामने आकर हमारा अभिलाषित धन हमारे समीप लाओ. (१४) देवान्वसिष्ठो अमृतान्ववन्दे ये विश्वा भुवनाभि प्रतस्थुः. ते नो रासन्तामुरुगायमद्य यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः.. (१५) वसिष्ठ वंश में उत्पन्न ऋषि ने मरणरहित देवों की वंदना की है. वे देव सभी लोकों में स्थित हैं. वे हमें आज अधिक यश देने वाला अन्न दें. हे देवो! तुम कल्याणकारी साधनों द्वारा हमारी रक्षा करो. (१५) सूक्त—६७ देवता—बृहस्पति इमां धियं सप्तशीर्णीं पिता न ऋतप्रजातां बृहतीमविन्दत्. तुरीयं स्विज्जनयद्विश्वजन्योऽयास्य उक्थमिन्द्राय शंसन्.. (१) हमारे पिता अंगिरा ने सत्य से उत्पन्न एवं सात छंदों वाली विशाल स्तुति को बनाया था. सर्वजनहितकारी अयास्य ऋषि ने इंद्र की प्रशंसा करते हुए एक चरण वाला स्तोत्र भी बनाया. (१) ऋतं शंसन्त ऋजु दीध्याना दिवस्पुत्रासो असुरस्य वीराः. विप्रं पदमङ्गिरसो दधाना यज्ञस्य धाम प्रथमं मनन्त.. (२) अंगिरागोत्रीय ऋषियों ने सत्य भाषण करते हुए व कल्याण का ध्यान करते हुए यज्ञ के सुंदर तेज को धारण करके प्रारंभ से ही बृहस्पति की स्तुति की. वे ऋषि दीप्त एवं बुद्धिशाली अग्नि के पुत्र हैं एवं उनका मन सरल है. (२) हंसैरिव सखिभिर्वावदद्भिरश्मन्मयानि नहना व्यस्यन्. बृहस्पतिरभिकनिक्रदद्गा उत प्रास्तौदुच्च विद्वाँ अगायत.. (३) बृहस्पति ने हंसों के समान शब्द करने वाले अपने मित्रों की सहायता से पणियों द्वारा ebook converter DEMO Watermarks*