ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 1684, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंदीर्घतन्तुर्बृहदुक्षायमग्निः सहस्रस्तरीः शतनीथ ऋभ्वा. द्युमान् द्युमत्सु नृभिर्मृज्यमानः सुमित्रेषु दीदयो देवयत्सु.. (७) हे विशाल स्तुतियों वाले, प्रधान दाता, अनेक प्रकार के हव्यों द्वारा आच्छादित, अनेक आहवनीय द्वारों से लाए गए, अतिशय प्रदीप्त एवं प्रधान पुरोहितों द्वारा अलंकृत अग्नि! तुम देवों की कामना करने वाले सुमित्र एवं उसके परिवार वालों के घरों में प्रज्वलित बनो. (७) त्वे धेनुः सुदुघा जातवेदोऽसश्चतेव समना सबर्धुक्. त्वं नृभिर्दक्षिणावद्भिरग्ने सुमित्रेभिरिध्यसे देवयद्भिः.. (८) हे अग्नि! तुम्हारे पास सरलता से दुही जाने वाली, एकमात्र सूर्य से संगत व अमृत देने वाली गाय है. तुम देवों की कामना करने वाले, दक्षिणायुक्त एवं प्रधान यज्ञकर्त्ता सुमित्रवंशियों द्वारा प्रज्वलित किए जाते हो. (८) देवाश्चित्ते अमृता जातवेदो महिमानं वाध्यश्वः प्र वोचन.. यत्सम्पृच्छं मानुषीर्विश आयन्तवं नृभिरजयस्त्वावृधेभिः.. (९) हे वध्यश्व द्वारा स्थापित अग्नि! मरणरहित देवों ने भी तुम्हारी महिमा का वर्णन किया है. जब मानवी प्रजा यह पूछने तुम्हारे पास आई कि देवों के साथ असुरों का नाश कौन करता है, तब तुमने सबके नेता एवं तुम्हारे द्वारा बढ़ाए गए देवों के साथ मिलकर विघ्नकारियों को जीत लिया. (९) पितेव पुत्रमबिभरुपस्थे त्वामग्ने वध्यश्वः सपर्यन्.. जुषाणो अस्य समिधं यविष्ठोत पूर्वां अवनोर्वाधतश्चित्.. (१०) हे अग्नि! मेरे पिता वध्यश्व ने इस प्रकार तुम्हारी सेवा की, जिस प्रकार पिता गोद में बैठाकर पुत्र का पालन करता है. हे अतिशय युवा अग्नि! तुमने मेरे पिता की समिधाएं प्राप्त करके विशेष बाधक शत्रुओं का भी वध किया. (१०) शश्वदग्निर्वध्यश्वस्य शत्रून्नृभिर्जिगाय सुतसोमवद्भिः. समनं चिद्दहंश्चित्रभानोऽव व्राधन्तमभिनद्वृधश्चित्.. (११) उस अग्नि ने वध्यश्व के सोमरस निचोड़ने वाले एवं यज्ञनेता ऋत्विजों की सहायता से सदा शत्रुओं को जीता. हे नाना तेजों वाले अग्नि! तुमने संग्राम में उन्हें जलाया. अग्नि ने बढ़े हुए हिंसकों को नष्ट किया. (११) अयमग्निर्वध्यश्वस्य वृत्रहा सनकात्प्रेद्धो नमसोपवाक्यः. स नो अजामींरुत वा निजामीनभि तिष्ठ शर्धतो वाध्यश्व.. (१२) वध्यश्व द्वारा स्थापित वे अग्नि शत्रुहंता, प्राचीन काल से विशेष दीप्त एवं नमस्कार से ebook converter DEMO Watermarks*