ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 1699, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंमरुद्गण उषाओं की किरणों के समान यज्ञ का आश्रय लेने वाले, कल्याण की कामना करने वाले, वरों के समान आभूषणों से सुशोभित, नदियों के समान गतिशील एवं चमकीले आयुधों व दूर जाने वाले पथिकों के समान दूर देश तक जाने वाले हैं. (७) सुभागान्नो देवाः कृणुता सुरत्नानस्मान्त्स्तोतृन्मरुतो वावृधानाः. अधि स्तोत्रस्य सख्यस्य गात सनाद्धि वो रत्नधेयानि सन्ति.. (८) हे देव मरुतो! तुम स्तुतियों से बढ़कर हम स्तुति करने वालों को शोभन धन एवं रत्नों से युक्त करो तथा हमारे सखा रूप स्तोत्र को स्वीकार करो. तुम सदा से हमें रत्न दान करते आए हो. (८) सूक्त—७९ देवता—अग्नि अपश्यमस्य महतो महित्वममर्त्यस्य मर्त्यासु विक्षु. नाना हनू विभृते सं भरेते असिन्वती बप्सती भूर्यत्तः.. (१) मैं मरने वाली प्रजाओं में मरणरहित अग्नि का महान् महत्त्व देखता हूं. इनके दोनों जबड़े अलग-अलग एवं दांतों से भरे हुए हैं. ये जबड़े स्तोता को न चबाकर लकड़ियों का भक्षण करते हैं. (१) गुहा शिरो निहितमृधगक्षी असिन्वन्नत्ति जिह्वया वनानि. अत्राण्यस्मै पड्भिः सं भरन्त्युत्तानहस्ता नमसाधि विक्षु.. (२) अग्नि का मस्तक गुप्त स्थान में छिपा हुआ है एवं उनकी सूर्यचंद्ररूपी आंखें अलग- अलग स्थानों में स्थित हैं. अग्नि काष्ठों को दांतों से न चबाते हुए केवल जीभ से खाते हैं. प्रजाओं के मध्य अध्वर्यु आदि इस अग्नि के पास पैदल चलकर आते हैं और हाथ उठाकर नमस्कार करके हव्य देते हैं. (२) प्र मातुः प्रतरं गुह्यमिच्छन्कुमारो व वीरुधः सर्पदुर्वीः. ससं न पक्वमविद्वच्छुचन्तं रिरिह्वांसं रिप उपस्थे अन्तः.. (३) बालक के समान यह अग्नि धरतीरूपी माता के ऊपर बड़ी-बड़ी लताओं एवं उनकी जड़ों की कामना करते हुए आगे बढ़ते हैं. यह धरती की गोदी में सूखे वृक्षों को पके अन्न के समान प्राप्त करते हैं तथा अपनी ज्वाला से वृक्षों को जलाते हैं. (३) तद्धामृतं रोदसी प्र ब्रवीमि जायमानो मातरा गर्भो अत्ति. नाहं देवस्य मर्त्यश्चिकेताग्निरङ्ग विचेताः स प्रचेताः.. (४) हे द्यावा-पृथिवी! मैं तुमसे सच कह रहा हूं कि अरणियों से उत्पन्न यह अग्नि अपने ebook converter DEMO Watermarks*