ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 1723, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंबन जाते हैं. अग्नि को यज्ञ-संपादक देवों की बुद्धि कहा जाता है एवं वे सबको जानते हुए सब स्थानों में जल्दी-जल्दी चलते हैं. (६) दृशेन्थो यो महिना समिद्धोऽरोचत दिवियोनिर्विभावा. तस्मिन्नग्नौ सूक्तवाकेन देवा हविर्विश्व आजुहुवुस्तनूपाः.. (७) जो अग्नि अपने महत्त्व के कारण दर्शनीय, प्रज्वलित स्वर्ग में स्थित एवं तेजस्वी बनकर दीप्त होते हैं, उन्हीं अग्नि के अंगरक्षक देवों ने स्तुतियां पढ़ते हुए हव्य डाला. (७) सूक्तवाकं प्रथममादिदग्निमादिद्धविर्जनयन्त देवाः. स एषां यज्ञो अभवत्तनूपास्तं द्यौर्वेद तं पृथिवी तमापः.. (८) देवों ने सबसे पहले मन से सूक्त वचन का चिंतन किया. इसके पश्चात् हव्य को उत्पन्न किया. वे अग्नि देवों के यज्ञपात्र एवं शरीररक्षक बने. उन अग्नि को द्युलोक, पृथ्वी और अंतरिक्ष जानते हैं. (८) यं देवासोऽजनयन्ताग्निं यस्मिन्नाजुहुवुर्भुवनानि विश्वा. सो अर्चिषा पृथिवीं द्यामृतेमामृजूयमानो अतपन्महित्वा.. (९) जिस अग्नि को देवों ने उत्पन्न किया, जिस अग्नि में विश्व की सब वस्तुओं का हवन किया जाता है. वह ही सरल गति वाले अग्नि अपनी विशाल ज्वाला से इस धरती और स्वर्ग को तृप्त करते हैं. (९) स्तोमेन हि दिवि देवासो अग्निमजीजनञ्छक्तिभी रोदसिप्राम्. तमू अकृण्वन् त्रेधा भुवे कं स ओषधीः पचति विश्वरूपाः.. (१०) देवों ने स्वर्ग में केवल स्तुतियों द्वारा द्यावा-पृथिवी को पूर्ण करने वाले अग्नि को अपनी शक्ति से उत्पन्न किया. उस सुखकारक अग्नि को देवों ने तीन भागों में विभक्त किया. वही अग्नि समस्त ओषधियों को पकाती है. (१०) यदेदेनमधुर्यज्ञियासो दिवि देवाः सूर्यमादितेयम्. यदा चरिष्णू मिथुनावभूतामादित्प्रापश्यन्भुवनानि विश्वा.. (११) जिस समय यज्ञ के पात्र देवों ने इस अग्नि और अदितिपुत्र देवों को स्वर्ग में स्थापित किया, वे उस समय जोड़े से विचरण करने वाले बन गए तभी सब प्राणियों ने उन्हें देखा. (११) विश्वस्मा अग्निं भुवनाय देवा वैश्वानरं केतुमह्नामकृण्वन्. आ यस्ततानोषसो विभातीरपो ऊर्णोति तमो अर्चिषा यन्.. (१२) ebook converter DEMO Watermarks*