ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 1750, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंजिसका इलाज करता है, हम उसीको बचाती हैं।” (२२) त्वमुत्तमास्योषधे तव वृक्षा उपस्तयः. उपस्तिरस्तु सोऽस्माकं यो अस्माँ अभिदासति.. (२३) हे ओषधियो! तुम सबसे श्रेष्ठ हो. सभी वृक्ष तुमसे निम्न हैं. जो हमें हानि पहुंचाता है, वह हमसे नीचा बने. (२३) सूक्त—९८ देवता—अनेक बृहस्पते प्रति मे देवतामिहि मित्रो वा यद्वरुणो वासि पूषा. आदित्यैर्वा यद्वसुभिर्मरुत्वान्तस पर्जन्यं शन्तनवे वृषाय.. (१) हे बृहस्पति! तुम मेरे कल्याण के लिए सब देवों के पास जाओ. तुम मित्र, वरुण, पूषा, आदित्यों तथा वसुओं के साथ इंद्र हो. तुम राजा शांतनु के लिए जल बरसाओ. (१) आ देवो दूतो अजिरश्चिकित्वान्त्वद्देवापे अभि मामगच्छत्. प्रतीचीनः प्रति मामा ववृत्स्व दधामि ते द्युमतीं वाचमासन्.. (२) हे देवापि! कोई ज्ञानी एवं गतिशील देवदूत बनकर तुम्हारे पास से मेरे समीप आवे. हे बृहस्पति! तुम मेरी ओर उन्मुख होकर मेरे पास आओ. मैं तुम्हारे लिए दीप्तियुक्त स्तुति अपने मुख में धारण करता हूं. (२) अस्मे धेहि द्युमतीं वाचमासन् बृहस्पते अनमीवामिषिराम्. यया वृष्टिं शन्तनवे वनाव दिवो द्रप्सो मधुमाँ आ विवेश.. (३) हे बृहस्पति! तुम एक दीप्तिशालिनी, दोषरहित एवं गमनशील स्तुति को मेरे मुख में धारण करो. उसी स्तुति द्वारा शांतनु के लिए आकाश से वर्षा आवे तथा मधुयुक्त रस टपके. (३) आ नो द्रप्सा मधुमन्तो विशन्त्विन्द्र देह्यधिरथं सहस्रम्. नि षीद होत्रमृतुथा यजस्व देवान्देवापे हविषा सपर्य.. (४) माधुर्ययुक्त वर्षा हमें भली प्रकार व्याप्त करे. हे इंद्र! अपने रथ पर स्थित हजारों प्रकार का धन हमें दो. हे देवापि! हमारे यज्ञ में बैठो, ऋतु के अनुसार होम करो एवं हवि द्वारा देवों को प्रसन्न करो. (४) आर्ष्टिषेणो होत्रमृषिर्निषीदन् देवापिर्देवसुमतिं चिकित्वान्. स उत्तरस्मादधरं समुद्रमपो दिव्या असृजद्वर्ष्या अभि.. (५) ebook converter DEMO Watermarks*