भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 1766, कुल 1855 में से

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पृष्ठ 1766

आवो यद्दस्युहत्ये कुत्सपुत्रं प्रावो यद्दस्युहत्ये कुत्सवत्सम्.. (११) हे शक्तिशाली इंद्र! सुमित्र ने तुम्हारे निमित्त इस प्रकार की सौ स्तुतियां बनाईं तथा दुर्मित्र ने भी सौ स्तुतियां बनाईं. तुमने दस्युहत्या के समय कुत्स के पुत्र की रक्षा की थी. (११) सूक्त—१०६ देवता—अश्विनीकुमार उभा उ नूनं तदिदर्थयेथे वि तन्वाथे धियो वस्त्रापसेव. सध्रीचीना यातवे प्रेमजीगः सुदिनेव पृक्ष आ तंसयेथे.. (१) हे अश्विनीकुमारो! तुम हमारे हव्य की कामना करते हो. जुलाहा जिस प्रकार कपड़ा बुनता है, उसी प्रकार तुम हमारी स्तुतियों को बढ़ाते हो. यजमान तुम दोनों के एक साथ आने के लिए स्तुति करता है. तुम सूर्य एवं चंद्रमा के समान अन्न को अलंकृत करो. (१) उष्टारेव फर्वरेषु श्रयेथे प्रायोगेव श्वात्र्या शासुरेथः. दूतेव हि ष्ठो यशसा जनेषु माप स्थातं महिषेवावपानात्.. (२) बैल जिस प्रकार घास के मैदान में चरते हैं, उसी प्रकार तुम यज्ञकर्त्ता लोगों के पास आते हो. रथ को चलाने वाले शीघ्रगामी अश्व के समान तुम धन देने के लिए स्तोता के पास आते हो. तुम दूत के समान यशस्वी बनो. जैसे भैंसे तालाब को नहीं छोड़ते, उसी प्रकार तुम भी सोमपान को मत छोड़ना. (२) साकंद्युजा शकुनस्येव पक्षा पश्वेव चित्रा यजुरा गमिष्टम्. अग्निरिव देवयोर्दीदिवांसा परिज्मानेव यजथः पुरुत्रा.. (३) हे अश्विनीकुमारो! तुम चिड़ियों के पंखों के समान एक-दूसरे से मिले रहते हो. तुम इस यज्ञ में दो विचित्र पशुओं के समान आए हो. तुम यजमान के यज्ञ में अग्नि के समान दीप्तिशाली हो तथा पुरोहितों के समान स्थानों में देवों की पूजा करते हो. (३) आपी वो अस्मे पितरेव पुत्रोग्रेव रुचा नृपतीव तुर्ये. इर्येव पृष्ट्यै किरणेव भुज्यै शृष्टीवानेव हवमा गमिष्टम्.. (४) हे अश्विनीकुमारो! तुम हमारे प्रति वही प्रेम रखो, जो माता-पिता पुत्र के प्रति रखते हैं. तुम अग्नि एवं सूर्य के समान तेजस्वी एवं राजा के समान शीघ्र काम करने वाले बनो. तुम धनी व्यक्ति के समान दूसरों का भला करने वाले व सूर्यकिरणों के समान योग देने वाले बनो तथा सुखी व्यक्ति के समान इस यज्ञ में आओ. (४) वंसगेव पूषर्या शिम्बाता मित्रेव ऋता शतरा शातपन्ता. वाजेवोच्चा वयसा घर्म्येष्ठा मेषेवेषा सपर्या३ पुरीषा.. (५) ebook converter DEMO Watermarks*