ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 180, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रति त्यं चारुमध्वरं गोपीथाय प्र हूयसे. मरुद्भिर्अग्न आ गहि.. (१) हे अग्नि! तुम इस सुंदर यज्ञ में सोमपान करने के लिए बुलाए जा रहे हो, इसलिए तुम मरुद्गणों के साथ आओ. (१) नहि देवो न मर्त्यो महस्तव क्रतुं परः. मरुद्भिर्अग्न आ गहि.. (२) हे महान् अग्नि देव! तुम्हारा यज्ञ और उसे करने वाले मनुष्य सर्वश्रेष्ठ हैं. उनसे बढ़कर कोई नहीं है. तुम मरुद्गणों के साथ आओ. (२) ये महो रजसो विदुुर्विश्वे देवासो अद्रुहः. मरुद्भिर्अग्न आ गहि.. (३) हे अग्नि! जो मरुद्गण तेजस्वी एवं द्वेषरहित हैं, जो अधिक मात्रा में जल की वर्षा करना जानते हैं, तुम उनके साथ आओ. (३) य उग्रा अर्कमानृचुरनाधृष्टास ओजसा. मरुद्भिर्अग्न आ गहि.. (४) हे अग्नि! जो मरुद्गण उग्र एवं इतने बलशाली हैं कि कोई उनका तिरस्कार नहीं कर सकता. उन्होंने जल की वर्षा की है. तुम उनके साथ आओ. (४) ये शुभ्रा घोरवर्पसः सुक्षत्रासो रिशादसः. मरुद्भिर्अग्न आ गहि.. (५) जो शोभासंपन्न होने के साथ-साथ उग्र रूपधारी भी हैं, जो शोभन धन संपन्न एवं शत्रुनाशक हैं. हे अग्नि देव! तुम उन मरुद्गणों के साथ आओ. (५) ये नाकस्याधि रोचने दिवि देवास आसते. मरुद्भिर्अग्न आ गहि.. (६) हे अग्नि देव! जो मरुद्गण आकाश के ऊपर वर्तमान प्रकाशपूर्ण स्वर्ग में शोभायमान हैं, तुम उनके साथ आओ. (६) य ईङ्खयन्ति पर्वतान् तिरः समुद्रमर्णवम्. मरुद्भिर्अग्न आ गहि.. (७) हे अग्नि! जो मरुद्गण उग्र मेघों को चलाते हैं और सागर की जलराशि को तरंगित करते हैं, तुम उनके साथ आओ. (७) आ ये तन्वन्ति रश्मिभिस्तिरः समुद्रमोजसा. मरुद्भिर्अग्न आ गहि.. (८) हे अग्नि देव! जो मरुद्गण सूर्यकिरणों के साथ-साथ सारे आकाश में फैले हुए हैं और जो अपनी शक्ति से सागर के जल को चंचल बनाते हैं, तुम उनके साथ आओ. (८) अभि त्वा पूर्वपीतये सृजामि सोम्यं मधु. मरुद्भिर्अग्न आ गहि.. (९) हे अग्नि! सोमरस से निर्मित मधु सबसे पहले मैं तुम्हें पीने के लिए दे रहा हूं. तुम ebook converter DEMO Watermarks*