भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 1814, कुल 1855 में से

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पृष्ठ 1814

देते हुए जल को छोड़ा एवं वृत्र के कर्मों का विनाश कर दिया. (१) अवासृजः प्रस्वः श्चञ्चयो गिरीनुदाज उस्रा अपिबो मधु प्रियम्. अवर्धयो वनिनो अस्य दंससा शुशोच सूर्य ऋतजातया गिरा.. (२) हे इंद्र! तुमने सबके जन्म के हेतुरूप जल को छोड़ा, पर्वतों को विचलित किया, गायों को हांककर ले गए, मधुर सोम पिया एवं वनों को बढ़ाया. यज्ञों के लिए उत्पन्न वेदमंत्रों द्वारा प्रवासित इंद्र के कर्मों से सूर्य दीप्तिशाली थे. (२) वि सूर्यो मध्ये अमुचद्रथं दिवो विदद्दासाय प्रतिमानमार्यः. दृळहानि पिप्रोरसुरस्य मायिन इन्द्रो व्यासच्चकृवाँ ऋजिश्वना.. (३) सूर्य ने आकाश में अपना रथ चलाया तथा देखा कि आर्यजन दासों का सामना कर रहे हैं. इंद्र ने ऋजिश्व के साथ मित्रता करके मायावी राक्षस पिप्रु की शक्ति नष्ट कर दी. (३) अनाधृष्टानि धृषितो व्यासन्निर्धीरदेवाँ अमृणदयास्यः. मासेव सूर्यो वसु पुर्यमा ददे गृणानः शत्रूँरृशणाद्विरुक्मता.. (४) शत्रुपराभवकारी इंद्र ने अपराजेय सेनाओं को नष्ट कर दिया तथा देव विरोधियों की संपत्ति का नाश कर दिया. सूर्य जैसे विशेष मास में धरती का रस खींचता है, उसी प्रकार इंद्र ने शत्रुनगरों का धन छीन लिया. (४) अयुद्धसेनो विभ्वा विभिन्दता दाशद्वृत्रहा तुज्यानि तेजते. इन्द्रस्य वज्रादबिभेदभिश्वथः प्राक्रामच्छुन्ध्यूरजहादुषा अनः.. (५) इंद्र ने स्तुतियां सुनते-सुनते चमकीले अस्त्र से शत्रु को मार डाला. इंद्र की सेना के साथ कोई लड़ नहीं सकता. इंद्र सब जगह जाने वाले तथा शत्रुनाशक वज्र से लोग डरें. इसके बाद सूर्य चले और उषा ने अपनी गाड़ी चलाई. (५) एता त्या ते श्रुत्यानि केवला यदेक एकमकृणोरयज्ञम्. मासां विधानमदधा अधि द्यवि त्वया विभिन्नं भरति प्रथिं पिता.. (६) हे इंद्र! तुम्हारा ही यह वीरकर्म सुना जाता है कि तुमने अकेले ही यज्ञविरोधी एवं प्रमुख राक्षस को मारा. तुमने आकाश के ऊपर सूर्य के जाने का प्रबंध किया. द्युलोक वृत्र द्वारा तोड़े गए रथचक्र को तुम्हारे द्वारा ही धारण करता है. (६) सूक्त—१३९ देवता—सविता व विश्वावसु सूर्यरश्मिर्हरिकेशः पुरस्तात्सविता ज्योतिरुदयाँ अजस्रम्. तस्य पूषा प्रसवे याति विद्वान्सम्पश्यन्विश्वा भुवनानि गोपाः.. (१) ebook converter DEMO Watermarks*