ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 1837, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंसूक्त—१६४ देवता—बुरे सपने का नाश अपेहि मनसस्पतेऽप क्राम परश्चर. परो निर्ऋत्या आ चक्ष्व बहुधा जीवतो मनः.. (१) हे मेरे मन पर अधिकार करने वाले दुःस्वप्न देव! तुम यहां से हटो, भाग जाओ और दूर घूमो. हे दूरस्थित पाप देवता! निर्ऋति से तुम कहो कि जीवित व्यक्ति के मनोरथ अनेक होते हैं. (१) भद्रं वै वरं वृणते भद्रं युञ्जन्ति दक्षिणम्. भद्रं वैवस्वते चक्षुर्बहुत्रा जीवतो मनः.. (२) जीवित व्यक्ति के मनोरथ विस्तृत, उत्तम एवं अभिलाषायोग्य वस्तु को चाहने वाले एवं उत्तम फल के इच्छुक होते हैं. यम अपने कल्याणकारी नेत्र से उसे देखते हैं. (२) यदाशसा निःशसाभिशसोपारिम जाग्रतो यत्स्वपन्तः. अग्निर्विश्वान्यप दुष्कृतान्यजुष्टान्यारे अस्मद्दधातु.. (३) हे अग्नि! हम आशावान् होकर, आशारहित होकर अभिलाषा पूरी करने पर जागते समय एवं सोते समय जो बुरे कर्म करते हैं, उन्हें तुम हमसे दूर ले जाओ. वे क्लेश देने वाले पाप हैं. (३) यदिन्द्र ब्रह्मणस्पतेऽभिद्रोहं चरामसि. प्रचेता न आङ्गिरसो द्विषतां पात्वंहसः.. (४) हे इंद्र एवं ब्रह्मणस्पति! हमने जो पाप किया है, अंगिरा के पुत्र प्रचेता उस शत्रुरूप पाप से हमें बचावें. (४) अजैष्माद्यासनाम चाभूमानागसो वयम्. जाग्रत्स्वप्नः सङ्कल्पः पापो यं द्विष्मस्तं स ऋच्छतु यो नो द्वेष्टि तमृच्छतु.. (५) आज हमने विजयी बनकर प्राप्त करने योग्य वस्तुएं पा ली हैं. हम आज पापरहित हो गए हैं. हमने जागते में, सोते में अथवा संकल्परूप में जो पाप किया है, वह हमारे द्वेषियों अथवा हमसे द्वेष करने वालों के समीप पहुंचे. (५) सूक्त—१६५ देवता—विश्वेदेव देवाः कपोत इषितो यदिच्छन्दूतो निर्ऋत्या इदमाजगाम. तस्मा अर्चाम कृणवाम निष्कृतिं शं नो अस्तु द्विपदे शं चतुष्पदे.. (१) हे देवो! यह कबूतर निर्ऋति का दूत है एवं बाधा पहुंचाने की इच्छा से हमारे पास आया ebook converter DEMO Watermarks*