भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 1843, कुल 1855 में से

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पृष्ठ 1843

हे इंद्र! तुम सायंकाल के समय पश्चिम में डूबे हुए एवं देवों द्वारा भी अज्ञात सूर्य को अगले दिन पूर्व में ले जाते हो. (४) सूक्त—१७२ देवता—उषा आ याहि वनसा सह गावः सचन्त वर्तनिं यदूधभिः.. (१) हे उषा! तुम शोभन तेज के साथ आओ. भरे हुए थनों वाली गाएं मार्ग पर चल रही हैं. (१) आ याहि वस्व्या धिया मंहिष्ठो जारयन्मखः सुदानुभिः.. (२) हे उषा! तुम प्रशंसनीय स्तुतियां लेकर आओ. यह काल शोभन दान वाले पुरुषों द्वारा दानयुक्त एवं यज्ञसमाप्ति का होता है. (२) पितृभृतो न तन्तुमित्सुदानवः प्रति दध्मो यजामसि.. (३) अन्न के स्वामियों के समान शोभन दान वाले हम धागों के समान इस यज्ञ का विस्तार करते हैं एवं उस यज्ञ से उषा की पूजा करते हैं. (३) उषा अप स्वसुस्तमः सं वर्तयति वर्तनिं सुजातता.. (४) उषा अपनी बहिन रात का अंधकार मिटाती है एवं अपना रथ भली प्रकार चलाती है. (४) सूक्त—१७३ देवता—राजा की स्तुति आ त्वाहार्षमन्तरेधि ध्रुवस्तिष्ठाविचाचलिः. विशस्त्वा सर्वा वाञ्छन्तु मा त्वद्राष्ट्रमधि भ्रशत्.. (१) हे राजन्! मैंने तुम्हें अपने राष्ट्र का स्वामी बनाया है. तुम हमारे बीच अधिकारी बनो एवं दृढ़ तथा अविचल होकर रहो. सभी प्रजाएं तुम्हें चाहें. तुम्हारे पास से राज्य का अधिकार भ्रष्ट न हो. (१) इहैवैधि माप च्योष्ठाः पर्वत इवाविचाचलिः. इन्द्र इवेह ध्रुवस्तिष्ठेह राष्ट्रमु धारय.. (२) हे राजन्! तुम पर्वत के समान अविचल होकर बढ़ो एवं राज्य से च्युत न बनो. तुम इंद्र के समान ध्रुव होकर यहां ठहरो एवं राष्ट्र को धारण करो. (२) ebook converter DEMO Watermarks*